स्वप्न वो सोए नहीं हैं

चल रहा अपनी गति से यह जटिल संसार है
मार्ग अपना तय करे, यह मनुज अधिकार है
हो व्यथित चाहे हृदय या वक्र तारों की दशा हो
जी सका वो ही मनुज जिसमे तभी भी ईप्सा हो
जो स्वर्णिम याद मुझको गुदगुदाते थे कभी
वो निराशा के भंवर में आज भी खोए नहीं हैं
स्वप्न वो सोए नहीं हैं
 
हो रही कहीं निर्वस्त्र पांचाली कुटिल शकुनी के पाशों पर
हंस रही कहीं वाचाल वासना खड़ी प्रेम की लाशों पर
हर भावना को नापने की है विश्व की अपनी तुला
नेह मेरा इसलिए हैं सूखे पत्तों सा जला
सिसकियों के बीच किंतु जो स्नेह संचित रंग थे
हो विकल नयनो ने उनको, अश्रु से धोए नही हैं
स्वप्न वो सोए नहीं हैं
 
विध्वंस क्षणिक, निर्माण शाश्वत ये अभी मैं जनता हूँ
लड़खडाकार फिर संभलने को विजय मैं मानता हूँ
प्रेम जाग को सौंप अपना फिर मेरा मन जगमगाता
आज फिर से मन  का पंछी पंख अपने फड़फड़ाता
वो अंकुरित होकर बनेगा उल्लास का आधार कल को
मैने निज आशा करों से बीज जो बोए अभी हैं
स्वप्न वो सोए नहीं हैं


तारीख: 18.06.2017                                                        कुणाल






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