तेरी आरज़ू

तुम फिरती बगिया में कलि-कलि,
मैं उड़ता जुगनू संग हर कहीं ।
किस बेल मैं तुझसे मिलूँ ओ साकी,
तुम डरती हो अंधरे से,
मैं उजाले से घबड़ाता हूँ ।

इस पार मेरी झोपड़,
उस पार तेरा शीशमहल,
किस पार तुझे ढूंढूं ऐ हमनशीं,
तुम रहती अमीरों संग,
और मैं गरीबों पर मरता हूँ ।

तुम्हें है नसीब  हर रहमतें,
मेरे दामन में बस बंदिशें,
किस नसीब से तुझे मांगूँ ऐ मुक़द्दर,
तेरी हर आरज़ू कुबूल खुदा को,
मेरी दुआओं का भी होता असर नहीं ।


तारीख: 06.06.2017                                                        जय कुमार मिश्रा






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