तुम ही हो


गुल भी हो गुलबहार भी हो,पढता हु जिसे सीने से लगाकर
प्रथम-प्रेयसी के मैसेजे की श्रृंगार में छुपी वह प्यार भी हो
पाकर तुम्हारे ध्वनि-चित्रों को किया श्रृंगार जब नायिका का 
झरनों की झरझराहट में बूंदों-सा टपकती मधुर झंकार भी हो


तुम्हारे ही ध्वनि-रूपों से जब मुखरित हुआ प्रथम प्रेम मेरा 
पवन के झोकों से उड़कर आयी भौरों की मधुर गुंजार भी हो
गढ़े थे कसीदे मैंने अपनी प्रेमिका के बदन पर चित्रमयी वह 
लज्जा में इतराती पलके गिराती इठलाती वह खुमार भी हो


महक उठा था तुम्हारे शब्द-रूपी इत्र से जब वह श्यामल बदन 
थिरकित-मन पुलकित-नयन वह मीठी चुभन की कटार भी हो
मैं करता हूँ प्यार की हदे पार वह बचपन का अनोखा दुलार
मेरी शख्शियत कर्मों में लिपटी सजल नयन की धार भी हो


तारीख: 20.10.2017                                                        धीरेन्द्र नाथ चौबे"सूर्य"






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