वंदना

 

शारदे!
 केवल इतना कर दे;


ज्यों तूने पीड़ा के प्रति पल पर 
गीत की लगायी मुहर, किया अमर
अश्रु और आँहों को, मंथन कर
भावों का अतिशय, और सिहर सिहर 
शोक-तप्त मानस को टेक दिया कविता पर;


वैसा ही सुख को सम्मान दे,
मुझको बस इतना वरदान दे,
जीवन में जब-जब जागे बसंत 
कविता का छूट नहीं पाए पंथ;
शणिक हास पीड़ा-सा उर्वर हो, वर दे;


मानस को सुख भी ऐसा रुचे अनंत,
भावों में इतनी सिरहन भर दे!
सबसे मधुर गीत न हों पीर के;
सुख के भी गीत मधुरतम कर दे !


तारीख: 03.08.2017                                                        राज हंस गुप्ता






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