वक़्त कितना हो गया,कुछ खोल दिल के राज तू

मन मेरा कहता मुझे,कि लिख ही दे कुछ आज तू
वक़्त कितना हो गया,कुछ खोल दिल के राज तू।

सच कहूँ ऐ दोस्तों! ये मन बड़ा नादान है
मानता खुद को कवि, और मांगता सम्मान है
चाहता है वाहवाही सब करे,और नाम हो
वाह क्या लिखते हो तुम ,सुनना यही हर शाम हो।

(पर)दिल मेरा कहता मुझे ,सुन मेरी भी आवाज तू
शब्द ही कविता नही,जान ले यह राज तू।

कह रहा हु सच तुझे ,ये शब्द तो बेजान है
मनना खुद को कवि, कविता का ही अपमान है
वाहवाही को भुला दे,और तू गुमनाम हो
जान ले कविता को पहले,और फिर बेदाम हो।

झूठ को सच जो सिखा दे,है वही कविता सही
दिल से दिल को जो मिला दे,है वही काविता सही
राम ही अल्लाह है,और अल्लाह ही तेरे राम है
दुनिया को जो ये दिखा दे,है वही कविता सही

मन से गंगा सी जो निकले,भाव से भरपूर हो
शब्द का जंजाल बन कर,ना किसी से दूर हो
मिट्टी में मिलकर रहे,ना आसमानों में बहे
खुद को आइना बना दे,है वही कविता सही
झूठ को सच जो सिखा दे,है वही कविता सही।

मोल उसका ना हो कोई,ना वो मंचो पर बिके
भूलकर लोगो के आंसू,ना वो महलो में दिखे
दिल से निकली आह हो,ना तालियों की चाह हो
आँख से आंसू मिटा दे,है वही कविता सही
झूठ को सच जो सिखा दे,है वही कविता सही।

पाक हो पूजा के जैसी,रब से उसका मेल हो
लोगो को खुश करने भर का,ना वो कोई खेल हो
दिल में बजता साज हो,वो रूह की आवाज हो
कवि को वैरागी बना दे,है वही कविता सही
झूठ को सच जो सिखा दे,है वही कविता सही।

खुद के गम को भूलकर के,औरों की वो आश हो
कवि वही है,दूसरे के,दर्द में जो निराश हो
धर्म जाति के पार हो,बेबस जनों का यार हो
प्यार को मजहब बना दे,है वही कविता सही
झूठ को सच जो सिखा दे,है वही कविता सही।  


तारीख: 12.08.2017                                                        प्रतीक






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