आधुनिका

 

 त्याग दिए भूषण लज्जा के
स्वाभिमान को धार लिया
मै आधुनिका हूँ मेने ही
परिवर्तन को आकार दिया
बदले है प्रतिमान जर्जर
अस्मिता को मान किया
मै आधुनिक हूँ मेने ही
नये युग का सन्धान किया
मेरा आँचल दूध नही
अब मेने रक्त उतारा है
बदले जग या बदले सृष्टि
ये संकल्प विचारा है
शक्ति का आगार
प्रज्ञ हूँ 
मेने निज श्री का
 स्वयं में आह्वान किया
में आधुनिका हूँ मेने ही
 जीवन जग को प्राण दिया
तलवार बन कर
तमस संहारा 
बनी कलम तो मैने ही
अभिव्यक्ति का आकाश जिया
मै आधुनिका हूँ मेने ही
परिवर्तन को आकार दिया


तारीख: 22.03.2018                                                        विजयलक्ष्मी जांगिड़






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