आलिंगन

कहने को तो साथ मेरे
पर बच्ची सी मासूम है तू
 
नींद भरी आँखें, सिकुडी सी नाक
सिमटे से होंठ, शंख से कान 
 
धराशायी कर देते हैं मुझे बडे आराम से... 
 
सुबह की खुशबू सी है तू
बिखरने को बेचैन
बेचैन इतनी कि
मेरी आँखें, मेरा कंपंन
मेरा आवारा असहाय जीवन
कहाँ तुझे चैन दे पाएगा।  
 
याद है ? जब तूने छुआ था, आैर बहुत करीब आ गई थी ? 
तेरी हँसी से फैली आँखों से कत्ल हुआ था मेरा ?
याद है ? नहीं है ना ? 
दिल किया था जकड लूँ, सूरज में चाँदनी पकड लूँ
सुनूं तेरी अनसुनी, अनछुअी साँसों को....
साँसें, जैसे ढलते तेज की किरण,
न ठंडी, न गरम ।
और फँसा दूँ उंगलियाँ तेरे बालों में
खोलूं कुछ उलझनें..

पर तू बस मेरी दोस्त है 
और फिर तुझे घर भी तो जाना होता है......


तारीख: 28.06.2017                                                        पुष्पेंद्र पाठक






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