आओ क्षण भर बैठो

आओ क्षण भर बैठो
देखो तो सही
वक्त नहीं बदला
हां पर तुम बदल गये हो
अब न कोई प्रणय
और न ही कोई विस्तार
प्रेम का दुःख का
स्नेह कहीं भंग हो चला
साज कहीं छूट गया
पुरानी सोच नये से इतर है
बदले भाव बदले अर्थ
भाव आत्मसात् नहीं 
आओ तुम एक बार फिर
क्षण भर बैठकर 
यथार्थ को देखो
मुझे क्षण भर देखो
मेरा स्थिर समर्पण
व्यर्थ नहीं धीर है मेरा
तुम आज भी तुम हो
मैं मैं से अलग कुछ
आओ लौटकर क्षण भर
एक बार फिर


तारीख: 16.11.2019                                                        मनोज शर्मा






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