अड़ा हूँ

जीवन के जिस कालखंड पर मैं खड़ा हूँ,
महसूस करता हूँ,
अपने इर्द-गिर्द घूमती कई दीवारें।
बड़ा जिद्दी मिजाज है मेरा,
उसी जगह पर अड़ा हूँ।

मुझे लगता है, और विश्वास भी है, 
ध्वंस कर दूंगा, एक दिन सारी दीवारें,
निर्मित करुँगा बंदिशों की ईंट से,
सृष्टि की सुन्दरतम रचना।

तब नही होगा कहीं भी कोई अस्तित्व,
जीवन की निर्मम अनीतियों का,
जो हर सकेगी जन-मन की,
कलुषित पीड़ा को।

मैं हमेशा अपने बच्चों को,
यह सीख देता हूँ कि,
निर्मित करो अपने भीतर,
एक लक्ष्य की दीवार,
की जिसमे स्वप्न हो,जागरण हो 
और मूल बात जीवन का अलग,
एक समर्पित अनुशासन हो।

फिर प्रयत्न करो पूरे जुनून के साथ,
और गिरा दो उस दीवार को,
क्योंकि तुम्हें अब दूसरी दीवार से,
टकराना है और खंडित करना है।

मैं हरदम यह जताता हूँ कि,
मेरे भीतर कई दीवारें खड़ी हैं,
और लड़ रहा हूँ, इनसे,
तुम्हारी तुष्टि या
किसी बात की पुष्टि के लिए नहीं,
शायद यही मेरी इयता हो,और
यही मेरी आत्मससंतुष्टि।

खुद के भीतर जब भी झाँकता हूँ,
अपने से कई गुना ज्यादा,
विराट व्यक्ति नजर आता है,
तब इन दीवारों का प्रयोग करता हूँ, 
सीढ़ियों की तरह,
लाँघ जाता हूँ, इन सीढ़ियों को भी,
जब चेष्टा करता हूँ,
उस विराट सत्ता तक पहुंचने की।

बावजूद इन सबके बार-बार वहीं पड़ा हूँ,
जहाँ खड़ा हूँ, जिद्दी मिजाज है,
उससे आगे निकलने के लिए,
अड़ा हूँ।


तारीख: 15.10.2017                                                        धीरेन्द्र नाथ चौबे"सूर्य"






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