अधूरी सफलता

जब एक साथ तुम रहते थे, उस सघन कुटुम्ब की छाया में | 
घुट घुट के इस तम में, मुद्रा को कमाकर क्या पाया ?

घर से निकले थे तब तुम कुछ अल्हड से बेफिकरे थे  | 
दुनिया की इस खुदगर्ज़ी में, खुद को दफनाकर क्या पाया ?

वो बड़े वाहन वो बड़े भवन,  क्या बुझा सकी अंदर की अगन | 
गाँवों से तो भाग गए, शहरों में बसकर क्या पाया ?

वो चलचित्र वो देहदर्शन, क्या यही तुम्हारा अन्तर्मन | 
मन तुच्छ होता चला गया, काया चमकाकर क्या पाया ?

निज स्वार्थ बस तुम आकर्षित थे, उन ऊँचे ऊँचे लक्ष्यों से | 
तन खोया मन खोया, अपनों को भुलाकर क्या पाया ?

आराम से जीना चाहते थे, तुम अपना निलय बनाकर | 
स्वस्वप्न विवश उस आँगन में, क्षण भर विश्राम कहाँ पाया ? 


तारीख: 02.08.2019                                                        अभिषेक






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