ऐ जिंदगी


ऐ जिंदगी तू लाख मुझे हराना चाहें
पर मैंने भी भला कब हार मानी हैं
मिले मौका धूप से कहना मेरी सदायें
तपिश से नीरज की दोस्ती पुरानी हैं
मेरे हौसले फैलाएं हैं जीत की बाहें
मैंने तो हर हाल जीतने की ठानी हैं
समंदर की लहरों की तिरछी निगाहें
अज़ी कश्ती चलानी हैं तो चलानी हैं
उड़ाने को आतुर हैं ये तूफ़ानी हवाएं
मुझे मुठ्ठी में दीये की लौ जलानी हैं
तू पल में तोला पल में माशा हो जाये
जिंदगी जितनी सुलझी उतनी परेशानी है
तू भागम भाग से पलपल थकाना चाहें
फिक्र किसे यहां चलती का नाम गाड़ी हैं
जिंदगी तेरे सफ़र की गुमशुदा सी राहें
पर मेरे कदमों में मंजिलो की रवानी हैं
ऐ जिंदगी तू लाख मुझे हराना चाहें
पर मैंने भी भला कब हार मानी हैं
आख़िरकार तू इकदिन होगी मातहत मेरे
मुझे तेरे आगे अपनी ही चलानी है
ऐ जिंदगी तू.........
पर मैंने भी भला......


तारीख: 20.10.2019                                                        नीरज सक्सेना






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