बता ऐ जिंदगी तुझे क्या मंज़ूर है ?

कभी दिख पड़ती है आँखों के सामने,
तो कभी जाती लगती दूर है।
तू ही बता ऐ जिंदगी,
कि तुझे क्या मंज़ूर है ?

तुझे आँसू अच्छे लगते हैं या लगती है हँसी,
तेरे लिए दर्द संभालूँ या बटोरूँ खुशी ।
मर्ज़ी के मालिक होकर भी,
तेरे सामने मज़बूर हैं।
तू ही बता ऐ जिंदगी,
कि तुझे क्या मंज़ूर है ?

दुनिया के बीच रहूँ या रहूँ सबसे किनारे ?
खुद ही दरिया पार करूँ या मांगूँ सबसे सहारे ?
ये ताकत है मेरी या
मुझे किसी बात का गुरूर है ?
तू ही बता ऐ जिंदगी,
कि तुझे क्या मंज़ूर है ?

दिल तोड़ने वालों को गले लगाया,
हँसाने  वालों को खुद मैंने रुलाया।
ये तेरी कोई शरारत है,
या सब मेरा कसूर है?
तू ही बता ऐ जिंदगी,
कि तुझे क्या मंज़ूर है?

अपने को कम आँका या भाग्य ने दुत्कारा?
किसी ने समझाया, तो किसी ने माँगा छुटकारा?
ये तेरी कोई चाल है,
या सब मेरे ज़ेहन का फितूर है?
तू ही बता ऐ जिंदगी,
कि तुझे क्या मंज़ूर है?


तारीख: 29.06.2017                                                        विवेक कुमार सिंह






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