छोड़ कर चल दिए तुम मुझे यूँ कहाँ

छोड़ कर चल दिए तुम मुझे यूँ कहाँ।
छोड़ कर चल दिए तुम मुझे यूँ कहाँ।
मैं अकेला खड़ा हूँ अकेला यहाँ।

तुम्हारे बिना मैं अधुरा सा हूँ।
गर मिलो तुम मुझे तो पूरा सा हूँ
लग रहा है अधुरा अब ये सारा जहाँ।

तुम गये छोड़ कर मुझको जिस राह में।
मैं तडपता हूँ अब तक तेरी चाह में।
लौटकर आओगे मैं मिलूँगा यहाँ।
छोड़ कर चल दिए तुम मुझे यूँ कहाँ।

ऐसे कब तक तुम मुझको यूँ तड़पाओगे।
छोड़ कर जाओगे,लौट कर आओगे।
ऐसा हो ना मैं तुमको मिलूं ना यहाँ।
छोड़ कर चल दिए तुम मुझे यूँ कहाँ।

तुझको पूजूं मैं तेरी ही चाहत करूं।
दिल तो चाहे कि तेरी इबादत करूं।
याद रखेंगे हमको ये दोनों जहाँ।
छोड़ कर चल दिए तुम मुझे यूँ कहाँ।

उम्मीदों का साया जो अब तक भी है।
जो खोया ना पाया वो अब तक भी है।
अब तो मिल लो मुझे,फिर मिलूँगा वहाँ।
छोड़ कर चल दिए तुम मुझे यूँ कहाँ।
छोड़ कर चल दिए तुम मुझे यूँ कहाँ।            


                         


तारीख: 21.06.2017                                                        प्रशांत पाठक






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है