धर्म खतरे में है

वो कहते हैं हमसे कि धर्म खतरे में है,
हमें बचाना है हमारा ईश्वर खतरे में है,
कुछ ले आये तलवारें, कुछ मशालें ले आये,
तो कुछ बंदूकें बारूद ले आये, कि पैगम्बर खतरे में है,
वो लगा रहें हैं आग नफ़रत की, हिंसा की ज्वाला जला रहें हैं,
ज़रा गौर करो कुछ और नहीं, चैन-ओ-अमन खतरे में है,
और हमें वो कहते हैं कि धर्म खतरे में है।

हम और तुम बिन समझे ये दांव पेंच, आते रहें हैं झांसे में,
आँखें मूँद चलते रहे हम, उनकी दिखाई राहों पे,
आँख खुली तो पाया कि, तेरा भी और मेरा भी घर खतरे में है,
और हमें वो कहते है कि धर्म खतरे में है।

पर कैसा है ये धर्म जो हिंसा भड़कता है,
क्या खुदा को लाशों की अभिलाषा है, या वो रक्त का प्यासा है,
जबरन परिवर्तन की इक बयार बह रही है,
मन परिवर्तन नहीं, वतन परिवर्तन नहीं, धर्म परिवर्तन की बात कह रही है,
प्रगति पथ पर आगे बढ़ते, शांति से जीते शहर खतरे में है,
और हमें वो कहते हैं कि धर्म खतरे में है।           


तारीख: 22.06.2017                                                        राजेंद्र धायल






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