अब उठो, तुम चल पड़ो

वो लक्ष्य जिसके कल्पना से ही सिहर उठ था अंतर्मन
जिसके आशा में साथ खड़े दिखते प्रकृति के थे कण-कण
फिर तेरी दृष्टि में ही तब घट गयी जीवन की सुंदरता
जब सुनकर स्तब्ध तू खड़ा रहा, कटु काल का प्रबल गर्जन
जीवन के सूने ललाट पर फिर उत्साह क हाथों से
कर आशा का तिलक तू,इससे बढ़कर स्रिंगर क्या है
अब उठो, तुम चल पड़ो, दूसरा उपचार क्या है
 
भाव वे अनुराग के बँध से चुके थे पाश में तुम
उसके लिए सर्वस्व अर्पण खोए इसी एहसास में तुम
आज उसको दूर पाकर माना खड़े हो तुम ठगे से
हो विकल अश्रु बहते प्रेम के निज लाश पर तुम
पास आएगी नही फिर से कभी जब जानते हो
तो विषैला सोच छोड़ो की उसके बिना संसार क्या है
अब उठो, तुम चल पड़ो, दूसरा उपचार क्या है
 
आज सपनो के महल बिखरे पड़े हो टूटकर
अपने सभी जाने लगे या आज तुझसे छूटकर
कल की प्यारी ईप्सा भी आज बोझिल लगने लगे
या अशस्त्र खुद को कर ले जीवन समर से रूठकर
फिर उठो और फिर लडो आशा खड़ग कर में लिए
छोड़ हौसले को यहाँ पर,दग्ध उर का अभिसार क्या है
अब उठो, तुम चल पड़ो, दूसरा उपचार क्या है


तारीख: 18.06.2017                                                        कुणाल






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है