कविता नयी

प्रेम उपेक्षित कोमल हृदय में भर गयी जब वेदना
लड़खड़ाते दो पगों को मिली चलने की प्रेरणा
नव घनो को देख मुख पर लालिमा जब छा गयी
कवि की प्रियतमा रूपी तब बन गयी कविता नयी
 
स्वप्न देखा जीत का था था उसी संग झूमना
पाया अपने को धरा पर जब था गगन को चूमना
चाह मेरी यथार्थ नभ में मेघ सी जब घुल गयी
प्यास बुझाने सरिता बन आई फिर कोई कविता नयी
 
तू गयी तो ये था सोचा जीवन पथ ही मोड़ दूं मैं
जिससे तेरे गीत लिखे वो कलम ही छोड़ दूं मैं
किंतु किसके लिए रुकी धरा वो सदा चलती रही
ये सरल संदेश देने आ गयी कविता नयी
 
मैं पराजय से कई बार चोट खाकर रो चुका हूँ
जीवन के निर्मम दौड़ में प्रेम कबका खो चुका हूँ
जब निराशा कठोर हो धूप बनकर आ गयी
वट वृक्ष जैसी छाँव लेकर आ गयी कविता नयी
जीवन संगिनी हरदम बनी है निस्वार्थ सी कविता मेरी
 


तारीख: 18.06.2017                                                        कुणाल






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