खुद

ढूंढते हो यूँ दर दर किसे तुम,

आओ बैठो तन्हा कभी मेरी तरह

अपनी गहरी साँसों को सुनो,
इनकी अलग सुर पहचानो

बंद करलो आँखे और,
आसमां की गहराइयाँ छानो

लबो से छूलो पवन की ठंढक,
हौले हौले, मद्धम मद्धम
कुछ गुनगुना लो,

हथेलियों पर करो नक्काशी
अपनी अलग फिजायें बना लो,

खुद से ही कर लो बाते सारी,
जी भरकर मन बहला लो

मिल जायेंगे यंहा सभी हल

बस एक बार,
बस एक बार

खुद से खुद की
मुलाकात करा दो।
 


तारीख: 30.06.2017                                                        अंकित मिश्रा






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है