मैं जब भी उदास होता हूँ!

मैं जब भी उदास होता हूँ,
तब सबसे अधिक,
तुम्हारे पास होता हूँ।

मन में तुम आ जाते हो,
निश्छल प्रेम की तरह,
बांध लेते हो अपने बाहु-पाश में,
खींचते हो और पोछ देते हो,
मेरे उन गालों पे गिरे,
जल-रूपी रक्त-कणिकाओं को।

कर जाते हो मन को चन्दन,
जब तुम्हारी हर बात के,
आस-पास होता हूँ,
मैं जब भी उदास होता हूँ,
तब सबसे अधिक,
तुम्हारे पास होता हूँ।

यूँ तो रोज न जाने कितने मिलते हैं,
बिछड़ने की कश्मकश में,
नसे रुंध जाती हैं,फिक्र में उनके,
आदतों का गुलाम हूँ,
बरबस बिखरता हूँ,
नहीं दीखता जब कोई पास,
तुम्हारे संग ही सहवास करता हूँ,
मैं जब भी उदास होता हूँ,
तब सबसे अधिक,
तुम्हारे पास होता हूँ।


तारीख: 02.07.2017                                                        धीरेन्द्र नाथ चौबे\"सूर्य\"






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