मेरा चाँद निकला


रँगते चांदनी हुई फ़ीकी
जब गली में मेरा चाँद निकला
लज़ाये आकाश के तारें
जुगनुओं के संग साथ निकला
लव्ज़ों में न हो सकें बयां
रूह से ग़ज़लों का ग़ुबार निकला
फिजाएं नज़रे हैं बिछाए
जब नूरे बाहर मेरा प्यार निकला
झील सी आंखे में उसकी
मोहब्बतें अज़ीम अख़बार निकला
मत पूछों ये कैसी दीवानगी
इक नज़र का ये अंजाम निकला।
मैं सब हार गया हमदम पर
संभल पाना दिले नागवार निकला
नाफ़िज़ वह जिंदगी की
लम्हा लम्हा उसी पे निसार निकला
रँगते चांदनी हुई फ़ीकी
जब गली में मेरा चाँद निकला
 


तारीख: 16.11.2019                                                        नीरज सक्सेना






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