मेरा खोया सपना

सपना था जो कही खो गया 
कल तक था मेरा 
आज बेगाना जैसे हो गया ।

कशिश कितनी थी, आस कितनी 
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी जीने की 
फिर तलाश कितनी । 

मन के अँधेरी में जैसे 
गुमसुम - सा सो गया 
चंचल था सपना 
गुमशुदा जैसे हो गया । 

बड़ा ही मोहक था 
ज़िन्दगी की जैसे झलक था ।
 
रंग न जाने थे कितने समाये 
मोहक, मदहोश 
जाने कितने राग सुनाये। 

अनजाने में ही अपनापन जैसे हो गया 
लुभावन था सपना
फ़साना जैसे हो गया । 

खोजता हूँ आज भी स्वपनलोक में कही 
रहस्य जीवन का 
हर राज़ दफ़न वहीँ । 

जिस्म से साया जैसे दूर कहीं हो गया 
तिलिस्मी था सपना 
अंधकार जैसे हो गया । 


तारीख: 28.06.2017                                                        विशाल अजमेरा






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