ना मिलने का गम न था

ना मिलने का गम न था 
गम तो बस इतना सा था की
देख के क्यों चल दिए 

खैर देख के क्यों चल दिए 
इस का भी उतना गम नही था 
हो सकता है मजबूरिया उनके साथ चल रही हो 
पर कम से कम एक बार मुस्कुरा तो सकती ही थी
 
खैर ये भी माफ़ 
कम से कम एक बार नजरे तो मिला ही सकती थी 
हम नजरो को देख के समझ लेते कोई मजबूरी उन के साथ चल रही है 


खैर छोडिए हम क्यों इतना सोच रहे है 
ये भी तो हो सकता है कि
जो हम उनके बारे में सोच रहे है 
वो हमारे बारे में ना सोच रही हो 
हो सकता है हमारे दिल में वो है 
और उन के दिल में कोई और 

खैर छोडिए हो सकता है 
हमारी किस्मत में यही लिखा हो 
हम उन के लिए वो किसी और के लिए 

हम ये क्यों भूल जा रहे है 
ये हमारे शहरी समाज का इक हिस्सा है 
खैर छोड़िये हम तो यू ही चलेगे 
और चलते रहेंगे


तारीख: 10.06.2017                                                        रजत प्रताप






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है