पलायन

मेरे घर में बीबी है,
बच्चे हैं , माँ – बाप हैं |
फिर भी है नौकरी नहीं ,
यही एक अभिशाप है ||

छोड़ के अपना घर – बाड़,
अब हम तो चले परदेश |
चाहिए दो जून की रोटी ,
और कोई कारण नहीं विशेष ||

चाहत ये नहीं कि,
बच्चे भी मेरी राह धरें |
अपितु पढ़ें – लिखें ,
और रौशन मेरा नाम करें ||

किसे नहीं चाह,
कि वो परिवार के साथ रहे |
किसे नहीं चाह ,
कि सर पर बुजुर्गों का हाथ रहे ||

मुझसे क्या गलती हुई,
क्या हुआ गुनाह ?
भरा पूरा परिवार छूट गया |
क्यूँ बाहर लिखी पनाह ?

आशा है , एक दिन ,
मैं फिर लौट कर आऊंगा |
मेरी धरती , मेरा घर ,
सबको गले लगाऊंगा ||


तारीख: 19.06.2017                                                        विवेक कुमार सिंह






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