पंख लौटा दो

याद है अब भी मुझे बचपन का अपने वो ज़माना
जब यूँ ही मैं चल पड़ा था बनाने नया एक आशियाना
एक आंधी ले गया सपने उड़ा कुछ इस तरह
सीखा मैंने करुण-क्रंदन, सीखा थक कर बैठ जाना
अनमने आवेश में सोचा पराजित हूँ मगर
बीते कल के दुर्गम गगन को आज छूना चाहता हूँ
पंख लौटा दो मुझे अब कि मैं उड़ना चाहता हूँ

एक सुबह निद्रा टूटी तो दरवाजे पर शोर सुना
भाग रही थी भीड़ कहीं, कहीं प्रतिस्पर्धा घनघोर सुना
छूट मैं जाऊ पीछे न इसलिए तो संग भाग चला
पाया वहां वेदना-रजनी, जहाँ शांति का भोर सुना
नहीं जानता हूँ क्या पाया इस जग से मैंने किन्तु
थक चुका इस विश्व से अब नव श्रृष्टि चाहता हूँ
पंख लौटा दो मुझे अब कि मैं उड़ना चाहता हूँ

मेरे यौवन की सुनहली सी प्रभा मिट जाएगी
सागर तट के पहले ही जीवन सरिता रुक जाएगी
मेरे जिन गीतों पर सारा झूमता जग आज है
महक उन गीतों की जग में कल कहीं खो जाएगी
तुम न रखो याद मुझको, मैं भुला सकता नहीं
बातों की तेरे कानो में अनुगूंज भरना चाहता हूँ
पंख लौटा दो मुझे अब की मैं उड़ना चाहता हूँ
 


तारीख: 19.06.2017                                                        कुणाल






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है