प्रेम-संदेश

आकाश को निहारते मोर 
सोच रहे , बादल भी इज्जत  वाले हो गए 
बिन बुलाए बरसते नहीं 
शायद बादल  को 
कड़कड़ाती बिजली डराती होगी 
सौतन की तरह । 

बादल का दिल पत्थर का नहीं होता 
प्रेम जागृत होता है 
आकर्षक  सुंदर, धरती के लिए 
धरती पर आने को 
तरसते  बादल 
तभी तो सावन में 
पानी का प्रेम -संदेशा भेजते रहे 
रिमझिम फुहारों से । 

धरती का रोम -रोम, संदेशा पाकर
हरियाली बन खड़े हो जाते 
मोर पंखों को फैलाकर
स्वागत हेतु नाचने लगते 
किंतु बादल चले  जाते 
बेवफाई करके 
छोड़ जाते हरियाली/ पानी की  यादें 
धरती पर 
प्रेम संदेश के रूप में । 


तारीख: 29.06.2017                                                        संजय वर्मा "दर्ष्टि "






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