रातें

रातें रह-रह के अपने रहनुमां से हाल पुछे है,
कि आँखे लाल क्यों हैं,भीगे क्यों हैं गाल पुछे है,  
जो साँसें एक थी तब ही भला क्या सुकून था मुझको.?
 जो टूटी डोर तो फिर दिल है क्यों बेहाल पुछे है..।
    
शहर में शोर था बेजा,कि वो तो मेरे हमदम थे..
मगर दिल नादां ना समझा कि ये तो मन के भरम थे..
जरा सी बात पे जो रंज का मौका ढूँढा किए..
झटक कर चल दिए क्या उनके लिए रास्ते कम थे..।

मिली मंज़िल मगर उनको जो तय एक रास्ते चले..
जो नैतिकता के संग और सच के वास्ते चले..
कि उसने रास्ते बदले कई,अपनी पिपासा में..
कुआँ कब प्यासे को,यहाँ राही को कब रास्ते चले..।

दरिया आग की,लहरे समन्दर की है मन मेरा..
निशा और भोर के इस द्वन्द्व से घनघोर मन मेरा..
कि तम को छाँट कर सुबह, निकलती है ये सब जानें..
नई उम्मीद की किरणों से सराबोर है मन मेरा..।

जाने वाले के गम में कोई यूँ रोएगा कब तक..?
पीछे मुड़ के भी उसने,कहो क्या देखा है अब तक..?
वो अपने रास्ते बदले,मैं तो हूँ एक राह का राही..
यूँ ही चलता रहूँगा,मुझको न मिली मंज़िलें जब तक..।

क्यों ढीला छोड देते लोग मन रूपी पतंग की डोर..?
छुपा लेते हैं क्यों मासूम चेहरे के तले एक चोर..?
कपट से क्षण का सुख तो है,नही है ह्रदय का संतोष..
कि रोको-रोको,कटी पतंग पे न चलता किसी का जोर..।

जो भटके राहों में तो लौट के फिर आओगे कैसे..?
भले ही घाव भरे,दाग को छुपाओगे कैसे..?
दुनियाँ खाई मे गिरने से कहाँ रोके आजकल..?
गिरे जो खाई में,उपर निकल कर आओगे कैसे..?

जमाना तो रसिक है,हर बात के रस पीता रहेगा..
तुम बोलो,उससे पहले लब को सीता रहेगा..
‘राकेश’ तो नैतिकता के उसूलों पर है कुर्बाँ..
ज़मीर के ही बल जीता रहा है,जीता रहेगा..।। 
 


तारीख: 22.06.2017                                                        राकेश “कमल”






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