शब्द प्रसव पीङा

 

आठ प्रहर ख़ुद को मैं खोदूँ
बंजर प्राणों को नित नित जोतूं
रातों रोऊंस्वयं को बोऊंपल पल खोऊँजागूं  सोऊं
फिरता सहरा में बन कस्तुरीमृग
पार  दिखताभटकूं डग डग
कब तक झेलूं ये स्वद्वंद्व क्रीड़ा.... 
हुई आज है बांझ कलममचले शब्द प्रसव पीङा....

 

झंझावात र्निनिमेष ताकतेगर्भगृह संज्ञा से बिछङा
अस्तांचल काल विचरतानिर्मेध लालिमा से कैसा झगङा
झंकार कहीं पर लोप हो रही
राग भैरवी ताल खो रही...... 
विचार सूखेअन्तर्मन सूखागंगा सूखा ओढ़ सो रही
कब तक झेलूं ये स्वद्वंद्व क्रीड़ा.... 
हुई आज है बांझ कलममचले शब्द प्रसव पीङा....

 

रही बोल दुपहरीग्रहण की भाषा
रहे बरसत बदरा पर चातक प्यासा
चहुंओर जलनिधी पर मेधा प्यासी मोरी;
ज्यूँ अनाद्य परिधी लिए शहद कटोरी......
बिना तेल दीपों का रेलानिनाद बीचशब्दभेद अकेला
कब तक झेलूं ये स्वद्वंद्व क्रीड़ा.... 
हुई आज है बांझ कलममचले शब्द प्रसव पीङा....

 

बहुत हो चुकी स्वद्वंद्व क्रीड़ा....
अब बहुत हो चुकी स्वद्वंद्व क्रीड़ा....
युद्ध है गहरातोङ के पहराहो सज्ज मूझे आना होगा
हुई बहुत अमावसजगा के साहस
अब वृंदगान गाना होगा......

अब वृंदगान गाना होगा......


तारीख: 22.07.2019                                                        उत्तम दिनोदिया






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