सिसकता बचपन और मौन समाज

ये किलकारियाँ क्यूँ निस्तब्ध
पड़ी हैं।
क्यूँ ये आँखें सपनो से नहीं
भय से भरी हैं।

इन नन्हें शरीरों पर खरोंचे
क्यूँ हैं।
क्यों ये खिलखिलाती नहीं
चुपचाप खड़ी हैं।
क्यों इन नन्ही जानो के घाव
दिखते नहीं किसी को,
क्यों मानवता इतनी बेजान
पड़ी है।

आक्रोशित होना चाहिए था
जहाँ सबको,
क्यूँ किसी माथे पर शिक़न
तक नहीं पड़ी है।
शर्म से झुक जाने चाहिए थे
जो सर
क्यूँ वहां गर्दनें इतनी ऊँची
खड़ी हैं।

गुस्सा बुरा होता है,
पर आज आने दो

उखाड़ फेंको ये सामाजिक व्यवस्था
जो अब भी मौन खड़ी है।


तारीख: 14.06.2017                                                        राहुल शब्द






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है