सोचकर निकले थे

सोचकर  निकले  थे,
दुनिया  बदल  देंगें
लहरें  आएँगी  तो  क्या,
हम  समंदर  में  नहाना  छोड़  देंगें?

लेकिन 
यह  दुनिया , आज  भी  वही  है 
बदल  दिया  है  उसने ,  मुझे 

वो  थी  एक  मुस्कान ,
पर  अब  याद  नहीं 
अब  तो  एक  से  लगते  हैं 
सभी  चेहरे ,
मिटटी  के  पुतले  से 

पर  धीरे - धीरे , जैसे  - तैसे 
सीख  लिया  है  मैंने  भी 
वो  नकली  चेहरे 
वो  चौड़ी - सी  मुस्कान 

और  फिर 
तुमने  भी  तो  साथ  छोड़ा  ना ,
तुम  अगर  गए  न  होते 
तो  शायद ,
हम  बदले  न  होते 

हाँ  इतना  जरूर  मालूम  है 
निकला  तो  मैं  ही  था ,
मगर  इस  बात  से  अनजान 
कि  जिसे  मैं  बदलने  चला  था ,
वो  तो  वहीँ , 
पीछे  छूट   रहा  था 
                   


तारीख: 02.07.2017                                                        सुबोध कुमार सिंह






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