सुकमा की शहादत

मैं तो शहीद हो गया यहां अपने भाई को बचाने में
लेकिन उसको ना दर्द हुआ मुझ पे ही गोली चलाने में।
भाई, मैंने तो तेरा ना कुछ काम कभी भी बिगाड़ा है
फिर क्यूँ तूने मेरी प्रेयसी के सुहाग का रंग उजाड़ा है।


उसकी बातों को सुन कर के बैठे वो बूढ़ा पिता आये
पत्थर सी मूर्त हुई आँखों में फिर थोड़ी अश्रु लाये।
फिर रुग्ण गले से दम भर के सीना को ताने वो बोले
जिसको सुन फट गई आसमान डर से सिंधु घाटी डोले।


तीन सौ से ज्यादा कुत्तों ने छुप कर है शेर पे वार किया
पूरी दुनिया बस देख रही क्या हिजडों की सरकार ने किया।
जब खुद में दम नही शेष बची तो मुँह तो खोल दिया होता
ऐ कमरे में सो रहे साहबों कुछ तो बोल दिया होता।


मानवाधिकार और राजनीति से बांध के मेरे शेरों को
अपने पैसों के लालच में मरवाये तुमने ढेरों को।
बस हामी भर देते साहेब फिर धुंध विशाल बना होता
थर्रा जाती सुकमा घाटी तब रक्त में काल सना होता।


भले वोट तुझे ना मिल पाता, ना साहेब डी जी पी बनते
कम से कम मेरे वीरों के लहू यूँ मिट्टी में ना सनते।


तारीख: 09.09.2017                                                        गोपाल मिश्रा






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