विष्ठा

थपक-पक-थपाक! कि ध्वनि
तभी कुछ अन-चाहा आ गिरा माथे पर। 
या तन के किसी अंग पर। 

सिहर उठा तन-मन। 
सोचा कौन है, मूर्ख!

अरे! ये तो मेरा ही है पुत्र!
एक-दो-तीन हर बार ,
माफ़! माफ़! माफ़!

अब आदत दोनों को पड़ ही गई। 
बोली धरा-चलो कोई बात नहीं।
मुझ में ही शायद हो कमी। 

उधर पुत्र-क्या हुआ? कहाँ जाऊँ?
चलता है, सब करते हैं। 
इससे भी नीच ,बहुत नीच कृत्य
पर माफ़ माँ के करने पर भी

पुत्र का पाप तो पाप ही रहेगा।
दिया श्राप तो श्राप रहेगा।

जिस मुट्ठी भर के लिए वह खून बहाता है। 
जिस कण को वह माथे पर सजाता है। 
जिस से मैं जन्मा, जिसमें मिल जाना है। 
वहीं पर यह सब! यह सब! यह सब!
                                      

व्याख्या- 
कुछ गिरने की ध्वनि और कुछ जो नहीं गिरना चाहिए। वही धरती के माथे पर आ गिरा यां धरती के किसी और अंग पर। यह कार्य धरती का पुत्र ही कर रहा था।
माँ बार-बार माफ़ समर्पित कर रही। और अब तो शायद बेटे को थूककर आगे जाने की और माँ को सहन करने की आदत पड़ गयी है। और इस पर भी माँ अपनी ही गलती निकालती है। और बेटा बेशर्मी से पूछता है कि कहाँ जाऊं? इस धरती को कितना संभालू। यहां पर तो इससे भी बुरे काम होते हैं।
परंतु क्या माँ के माफ़ कर देने पर भी क्या पुत्र का पाप-श्राप कम हो जाएगा?
जिस मुट्ठी भर के लिए सैनिक खून बहाता है, माथे पर लगाता है। जिस मिट्टी से हम सब का जन्म हुआ जिस में मर जाना है वहीं पर यह गंदगी फैलाना कहाँ तक उचित है।


तारीख: 29.10.2017                                                        मुक्ता शर्मा






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