व्यथा

मैं द्विलिंगी समाज से क्यों पृथक
क्यों प्रताड़ित शोषित तिरस्कृत
क्यों नहीं समाज को मैं स्वीकृत 
मुख्यधारा से मैं सदा वंचित
जनमानस की हंसी का पात्र भर
मैं द्विलिंगी समाज से क्यों पृथक।

हाँ हूँ मैं किन्नर
तो क्या इसमें दोष है
ना जाने मात-पिता को क्यों मेरे इस शरीर से असंतोष है
मेरा भी है इतिहास अमर
फिर समाज समझता क्यों मुझे विषधर
पग-पग पर होता अपमान मेरा
माता-पिता द्वारा मैं तिरस्कृत
कूड़े के ढेर की शोभा भर
मैं द्विलिंगी समाज से क्यों पृथक।

संविधान ने दिए है अधिकार मुझे
पर क्या मुख्यधारा ने इसे स्वीकारा है
है नाम मेरा भी तुम्हारी तरह
पर क्या कभी किसी ने मेरे नाम से मुझे पुकारा है
हिजड़ा-हिजड़ा कहकर केवल मेरा जुलूस निकाला है
मैं द्विलिंगी समाज से क्यों पृथक।

आएगा एक दिन वह भी 
जब सबको होगा गर्व मुझपर
देंगे उदाहरण मेरा ही
कहेंगे वह रहा अधूरी देह पुत्र पुत्री अमर
सुविधाओं से मैं सदा वंचित
पर होगा एक दिन वह भी 
जब मेरी छाप होगी सबके हृदय पर अंकित।


 


तारीख: 20.10.2019                                                        कीर्ति मल्लिक






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