ज़िन्दगी

ले चल मुझे भी ऐे ज़िन्दगी ;
जहाँ  तू  जा रही है।
शायद तू समझ ले मुझे;
वरना मेरी मौत हाज़िर है,
जो मुझे बुला रही है।

कभी सोच तो जरा मेरा यहाँ क्या काम है
साथ ले चल मुझे; गिरी तो हर जगह बदनाम है।
हक़ जमा रहे हैं  मुझपर  वो भी लोग;
जो मेरे लिए आजतक गुमनाम थे।।
तू  भी देख मेरी ज़िन्दगी जो मेरे लिये सिर्फ सज़ा रही है।
ले चल मुझे भी ए ज़िन्दगी;
जहाँ तू जा रही है।।

मेरे लिये बचा ही क्या है यहाँ;
हर कोई मेरे मरने का इंतज़ार कर रहा है|
जी कर करूँगा भी क्या।
जखम ज़िन्दगी का कोई नही भर रहा है।
तमाशबीन  हो गए है लोग;
और उन्ही की ज़िन्दगी गुज़रे जा रही है।
ले चल मुझे भी ए ज़िन्दगी;
जहाँ तू जा रही है।


तारीख: 14.06.2017                                                        गिरीश राम आर्य






नीचे कमेंट करके रचनाकर को प्रोत्साहित कीजिये, आपका प्रोत्साहन ही लेखक की असली सफलता है