भारत में युवा प्रकाशकों की कमी क्यों ?

अभी निकल चुकी 23 नवम्बर की तारीख़ को मैं एक विवाहोत्सव में शामिल होने गया था । जब मैं प्रीतिभोज में शामिल होने गया, मैंने खाने की प्लेट उठायी और भोजन लेने आगे बढ़ चला। काफी भीड़-भाड़ थी किसी तरह बचते-बचाते अपनी प्लेट में आवश्यकतानुसार भोजन लेकर मैं बाहर आया। बाहर आकर मैं खाने ही जा रहा था कि कन्या के पिता मुझे व्यवस्था का जायजा लेते दिखाई पड़ गए तो मैंने सोचा कि मैं कन्या पक्ष से हूँ इसलिए औपचारिकता स्वरुप ही सही लेकिन कन्या के पिता से जो की मेरे जानने वाले हैं, शादी के बारे में कुछ तो पूंछना ही चाहिए! इसलिए मैंने उनसे बात चीत शुरू कर दी। बात चीत के दौरान वर के बारे में पूंछा तो पता चला कि वर इंजीनियर है किसी प्राइवेट कम्पनी में जॉब करता है। यह सुनकर मेरे मन में पिछले २ वर्ष से चल रही एक खोज या कहें कि जिज्ञासा पुनः जागृत हो गयी ।

दरअसल मैं पिछली जितनी भी हिन्दू मुस्लिम शादियों में शरीक हुआ हूँ । वहां मैंने पड़ताल करने की कोशिश की तो मुझे बहुतायत में वर- कन्या इंजिनियर-डॉक्टर या कुछ अन्य भी प्रोफेशन्स से जुड़े मिले किन्तु कोई भी ऐसा वर या कन्या मुझे याद नहीं कि जिसकी शादी में मैं शामिल हुआ हूँ, वह पढ़ लिखकर एक प्रकाशक बना है और उसकी इसी उपलब्धि को लेकर धूम धाम से उसकी शादी तय की गयी है । शादी तो एक बात हुयी। मैंने कहीं भी अपने किसी परिचित से यह नहीं सुना कि उनका पुत्र या पुत्री प्रकाशन सम्बंधित कोई कोर्स कर रहे हैं। ऐसा क्यों ? क्या प्रकाशक बनना इतना आसान है या फिर प्रकाशक का समाज में कोई महत्व नहीं है ? क्योंकी छोटे छोटे व्यवसाय एवं पदों से जुड़े तमाम कोर्स भारतीय शिक्षा व्यस्था में उपलब्ध हैं सिवाय प्रकाशन सम्बन्धी कोर्स के ।

जहाँ तक मैं जानता हूँ कोई व्यक्ति प्रकाशन सम्बंधित व्यवसाय से यदि जुड़ना चाहता है तो उसे या तो किसी प्रकाशन कम्पनी में नौकरी करके वहां से सीखना होता है या फिर यह व्यवसाय पीढीगत हस्तांतरित होता है । सीधे तौर पर ऐसे व्यवसाय से जुड़ने के लिए प्रशिक्षण लेने या प्रमाणपत्र लेने की कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। जिससे तमाम युवा इस व्यवसाय से वंचित रह जाते हैं।

साहित्य समाज का आइना होता है और साहित्यकार समाज का पथ प्रदर्शक । साहित्य रचना कर एक इंसान समाज का पथ प्रदर्शक बनता है और उसे समाज सर आँखों पर बिठाता है । किन्तु इस पथप्रदर्शक को रचते हुए समाज तक पहुंचाने वाले (प्रकाशक) को रचित होने या तैयार करने का कोई माध्यम ही समाज में उपलब्ध न होना एक समाज को समृद्ध नहीं होने दे सकता। ज़रुरत है कि प्रकाशन सम्बंधित बारीकियों को सिखाने के लिए विभिन्न संस्थाए आगे आयें । ताकि एक कुशल एवं सामाजिक ज़रूरतों को देखते हुए साहित्य सृजन को प्रोत्साहित करने वाले प्रकाशक निकल कर सामने आयें । जिससे कालांतर तक साहित्य समाज का आइना बना रहे। इस कड़ी में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े युवाओं की भारी कमी है। इसका सबसे बड़ा कारण युवाओं को प्रकाशक के महत्त्व एवं प्रकाशक बनने की विधि को ठीक से न जान पाना है। यह लेख मैं इसलिए लिख रहा हूँ ताकि यह लेख लोगों तक पहुंचे और प्रकाशन व्यवसाय से युवाओं को जुड़ने की प्रेरणा मिले। जिससे नयी पीढ़ी की उत्तम साहित्य निकलकर समाज के सामने आ सके ।

यह लेख लिखते हुए मुझे ख़ुशी इसलिए हो रही है क्यूंकि बहुत खोज के पश्चात मुझे यंग प्रोफेसनल प्रोग्राम २०१६ के बारे में जानकारी मिली और मुझे लगा यह जानकारी मुझे अन्य लोगों से भी साझा करनी चाहिए। ताकि युवा इस व्यवसाय को भी विकल्प के तौर पर समझें। यंग प्रोफेसनल प्रोग्राम २०१६ इंडिया इंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में 2 और 3 दिसंबर को आयोजित किया जायेगा। इस वर्कशॉप में यंग प्रकाशकों को नए स्टार्टअप को शुरू करने और उसे मुकाम तक पहुँचाने के लिए भी प्रेरित किया जायेगा तथा जरुरत पड़ने पर उन्हें उचित सहायता भी की जाएगी। यह ऐसे यंग प्रकाशकों के लिए एक सुनहरा मौका है जो प्रकाशन की आधुनिक तकनीकी के बारे में जानना चाहते हैं। इसमें इंटरनेशनल लेवल के प्रकाशक प्रशिक्षण देने के लिए शामिल होंगे एवं प्रकाशन इंडस्ट्री के जाने-माने दिग्गज युवाओं को प्रकाशन के गुर सिखायेंगे। इसका आयोजन जीबीओ संस्थान कर रहा है।

ख़ास एवं सोचने वाली बात यह है कि इस कार्यक्रम का आयोजन कई वर्षों से प्रति वर्ष किया जाता है किन्तु मुझे काफी प्रयास के बाद इसकी जानकारी इस वर्ष मिल सकी है और मैं इसे मिस नहीं करना चाहता । इस आयोजन की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें हर साल सिर्फ 30 युवा प्रकाशकों को ही यह ट्रेनिंग दी जाती है।

पत्रकारिता, राजनीति और सेल्स तथा मार्केटिंग से जुड़े लोग इस वर्कशॉप का हिस्सा बन सकते है। इस वर्कशॉप में सीडफण्ड के सलाहकार आर। श्रीराम, यूगेन उल्मर प्रकाशन के काटजा स्प्लिचल और निल्सन बुकस्कैन के एसोसिएट डायरेक्टर विक्रांत माथुर युवाओं के साथ अपना अनुभव साझा करेंगे।

अगर आपके पास भी कुछ अलग करने का जूनून है तो आप इसमें शामिल हो सकते है। अधिक जानकारी के लिए आप http://publisherstraining.com/ पर लॉन्ग इन कर सकते हैं। ऐसे आयोजनों से उम्मीद बंधती है कि प्रकाशन की दुनिया में भी युवाओं का परचम लहराएगा । और युवा प्रकाशक युवा साहित्यकार की भावना को हुबहू समझ पायेंगे जैसा वह सोचता है । जिससे किसी भी युवा साहित्यकार के तथ्यों को भावना का ख़याल रखते हुए ही संपादित किया जायेगा ।


तारीख: 07.06.2017                                                        मनीष ओझा






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