झूठ और शक 

             झूठ शक का जनक होता है, अनचाहे या चाहकर भी जब हम एक झूठ बोल देते हैं तो बदले में हमें सौ झूठ बोलना पड़ता है । परंतु नीति-पुस्तिका बतलाती है कि हमें झूठ नहीं बोलना चाहिए । झूठ बोलना पाप है । कहा भी गया है कि, “.... झूठ बोले कौवा काटे ।” इस बोल को लेकर ‘बॉबी’ फिल्म का एक गीत भी लिखा जा चुका है । यह गीत उस जमाने में खूब चला था । हरेक लोगों की जुबान पर यह गीत हुआ करता था । फिर भी लोग झूठ बोलने से कहाँ चूकते हैं और कहाँ नीति-निर्देशिका का पालन करते हैं । नीतियाँ तो सिर्फ़ नीतिशास्त्रों की बातें होकर रह गईं । लोग लयबद्ध गीत गाते थे पर उसमें निहित सारगर्भित व प्रेरक बात को थोथा समझकर उड़ा देते थे । और आज भी लोगों की स्थिति उससे कोई भिन्न नहीं है ।

आज की दुनिया झूठ पर टिकी है और यहाँ का बाज़ार भी झूठ पर ही टिका है । नेता झूठ बोलता है, अभिनेता झूठ बोलता है, मंत्री झूठ बोलता है, संतरी झूठ बोलता है । बस, हर जगह अथवा चारों तरफ  झूठ और झूठ का बाज़ार है ।

असत्य या मिथ्या या झूठ..... ! जब आदमी झूठ या झूठ पर झूठ बोलता है और बातों का या घटनाओं का तारतम्य नहीं मिलता है तो सामने वाले को शक अपने घेरे में खींच लेता है और वह शक करने लगता है, झूठ का पीछा भी करता है । तब उस समय उसका शक करना जायज हो जाता है । परन्तु कुछ लोग शक्की किस्म के होते हैं । वे गाहेबगाहे हर चीज़ या हर बात या हर घटना को शक की नज़र से देखते हैं और खुद धीरे-धीरे जलते रहते हैं । जलने की यह गति इस प्रकार शनैःशैन: चलती है कि खुद भुक्तभोगी को भी पता नहीं चलता है कि वह कब मानसिक और फिर मानसिक से शारीरिक रोगी बन गया ? फिर जब वह किसी वैद्य के सम्पर्क में जाता है तब उस वैद्य के लिए वह सिरदर्द बन जाता है और उसका रोग उसके लिए   । चूँकि शक एक मानसिक बीमारी है, जो अधिकांश लोगों के मन-मस्तिष्क को अपनी चपेट में लिए हुए है । अत: ऐसे ही तमाम लोग परिवार व समाज के दुश्मन होते हैं । अपनी तो जिंदगी बर्बाद करते ही हैं दूसरों की ज़िन्दगी भी बर्बाद कर देते हैं ।

ज्यादातर मैंने देखा हैं कि शक की गुंजाइश स्त्री-पुरूष के संबंधों में मिलता है । ऐसा इसलिए क्योंकि यह रिश्ता बड़ा ही नाजुक होता है । स्त्रियाँ कम शक्की होती हैं । परंतु पुरुष शक करने के मामले में एकदम अग्रणीय होते हैं । कुछ पुरुष तो जैसे जन्मजात शक्की किस्म के होते हैं । हर मामले में अथवा हर बात-काम को शक के निगाह से देखते हैं । जैसे अब से पहले जो भी घटना क्रम चल रहा था, उसे वो लुक-छिप कर देख रहे थे या उसका पीछा कर रहे थे ।

शक की महत्ता को विश्व के प्रायः हरेक देशों ने महिमान्वित किया है, फिर हमारा देश इससे अछूता कैसे रह सकता है ! हमारी भारतीय कानून व्यवस्था ने भी शक को आधार मानकर सामाजिक, पारिवारिक व आपराधिक मामलों मे कई कानून प्रतिपादित किये हैं । भारतीय प्रशासनिक  पुलिस विभाग व भारतीय प्रशासनिक जाँच ब्यूरो तो जैसे शक के बिना पर ही चलते हैं । कोई अपराधी हो या न हो चाहे वह कोई आम आदमी ही क्यों न हो अगर शक की सूई उसकी ओर मुड़ गई हैं, तो पुलिस के हत्थे चढ़ने से उसे कोई रोक नहीं सकता है ।

और जब एक बार पुलिस या सी०आई०डी० के हाथों आप लग जाते हैं, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि आगे-आगे क्या होगा ? फिर लगाओ आप कोर्ट- कचहरी का चक्कर । जीना दूभर हो जाता है । यही कारण है कि हमारा भारतीय समाज इस भारतीय पुलिसिया व्यवस्था को नकारता रहा है और इसे अँग्रेज़ियत शासन व्यवस्था की छाया मानता है ।

झूठ..... ! झूठ और वकील का तो जैसे चोली-दामन का रिश्ता है । वकील की भी वकालत झूठ की बिना पर ही टिकी है । कुछ को अपवाद मान लिया जाय तो पूरी वकालत के व्यवसाय में वकील झूठ की रोटी खा रहे हैं । झूठ पर झूठ और तारीख पर तारीख..... सब कुछ झूठ का पुलिंदा हैं । यहाँ भी यही कारण है कि हम भारतीय लोग सालों कोर्ट का चक्कर काटते रहते हैं और उस पर भी केस का निर्णय अधूरा रह जाता है । और कहीं निर्णय पूरा भी हुआ तो हम इस दुनिया से उठ गए होते हैं ।

जहाँ तक देखा जाये तो झूठ तो झूठ है ही । परन्तु फिर भी झूठ का एक फायदेमंद पहलू भी है । वह यह कि कभी-कभी झूठ बोलकर किसी की जान बचा ली जाती है, तो कभी किसी को हृदयाघात होने से रोक लिया जाता है, तो कभी किसी के साथ अनहोनी होने से टाल ली जाती है । अत: कभीकभार झूठ न्यायोचित हो जाता है । इसी तरह कभीकभार शक भी अनुचित नहीं होता है क्योंकि जब किसी गम्भीर मामले की वास्तविकता या सच्चाई सामने आती है तो अनायास ही शक करने वाले के मुँह से निकल पड़ता है कि, ....... देखा मेरा शक सही था । और दूसरी तरफ जब बात में कोई दम नहीं होता या सच्चाई कुछ और होती है तो मजबूरन उसे कहना पड़ता है, -- .....मेरा शक करना गलत था ।।।


तारीख: 17.12.2017                                                        दिनेश एल० जैहिंद






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