पाकिस्तानी

1.

पता है हम क्या हैं?
हम सब के सब पाकिस्तानी हैं।
पाकिस्तानी क्यूँ? 
क्योंकि हम हिंदुस्तान में रहते हैं।
हिंदुस्तान में रहते हैं तो फिर पाकिस्तानी कैसे हुए?
पाकिस्तानी ऐसे क्योंकि हम दूसरे राज्यों में रहते हैं।

यंहा हम पाकिस्तानी इस तरह से हैं क्योंकि जब हम दूसरे राज्यों में पढ़ने या कुछ कमाने की तलाश में जाते हैं तो वँहा हमे घिन्न से देखा और नासमझ समझा जाता है। और ऐसा सिर्फ एक राज्य या प्रदेश के साथ नहीं है। ये हर जगह है, हर प्रदेश में है, हर गली में और हर मोहल्ले में है।
आप इस देश में कहीं भी चले जाओ आपको एक इंसान के रूप में नहीं देखा जाता, आपको सबसे पहले देखा जाता है एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो किसी के घर में घुसा हो, जिसे उसके व्यवहार से नहीं बल्कि उसके पहनावे, रहन सहन, रंग और उसकी बोलचाल की भाषा से आंका जाता है।
इस हिसाब से तुम और हम पाकिस्तान में हैं। पाकिस्तान मैं बस इसलिए कह रहा हु क्योंकि हमें लगता है कि पूरा देश अगर किसी देश या उसके लोगो को नापसंद करता है तो वो है "पाकिस्तान"।
असल बात तो ये है कि हम एक दूसरे को ही सबसे ज्यादा नापसंद करते हैं। 
हम एक दूसरे को नाम से नहीं उसके सम्बंधित राज्य या धर्म से जानते हैं...
"अरे वो गंवार है, बिहारी है। 
अरे उसके पास दिमाग नहीं है, वो हरियाणवी है। 
अरे वो दिमाग से उचट है, वो मराठी है।
अरे वो बहुत स्वार्थी है, बंगाली है।"

ये है हमारा किसी को परखने का तरीका हम अपने राज्य या देश को छोड़कर बाकी सारे जगह के लोगो को खुद से बेवकूफ या अनपढ़ समझते हैं। बस इसलिए क्योंकि सामने वाला हमारी भाषा नहीं समझता, हमारे तरह नहीं रहता, हमारे रंग का नहीं है, इसका मतलब वो हमसे नीच है।

और इसका उदाहरण आपको हर जगह हर तबके में मिलेगा, वो चाहे सरकारी कार्यालय हो या फिर आपके काम करने या पढ़ने की जगह। आप कही भी जाओ आपको भेद भाव ही मिलेगा सिर्फ, क्योंकि आप पाकिस्तानी हो।

मैं ये सब क्यों कह रहा हूँ?
क्या इससे किसी को कोई फर्क पड़ेगा?
कभी नहीं पड़ेगा। लेकिन मैं ये सब बस इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि मैं समझता था कि मैं हिंदुस्तान में रहता हूं और एक हिंदुस्तानी हूँ, लेकिन कल एक ऐसी घटना हुई जिसने शायद मुझे ये एहसास कराया की तुम एक अलग हिंदुस्तान में हो जहाँ तुम एक पाकिस्तानी हो।


2.


रात करीब दो बजे मैं सोने की कोशिश में था, तभी अचानक लगा की कोई चिल्ला रहा है और आवाज किसी लड़की की थी। 
मैं उठकर बैठ गया। पता चला आवाज सड़क से आ रही है, मै तुरंत बालकनी की तरफ भागा, बहार देखा की गली में ऑटो-रिक्शा जा रहा है जिसमे से लड़की के चीखने की आवाजें आ रही है और वो ऑटो बेतरतीब तरीके से चल रहा है। अँधेरा होने के कारण मैं उसका नम्बर प्लेट नहीं देख पाया। ऑटो जा चूका था, और मैं अपनी बालकनी में अवाक् खड़ा था।

"आप वँहा होते तो क्या करते?
कुछ नहीं!"
जी हां। आप कुछ भी नहीं करते क्योंकि आपका उस लड़की से कोई संबंध नहीं है, और आप तमाशा देखने के इतने आदि हो चुके हैं कि आपको कोई फर्क नहीं पड़ता।
दो पल के लिए शायद उस लड़की के लिए मन में हमदर्दी जागती और फिर चादर तान कर देश की हालत पर चिंतन करते और सो जाते। क्योंकि हमें ऐसे तमाशे देखने की आदत है, इस देश ने हमे बस तमाशे ही दिखाये हैं बचपन से और हमने बस मजे लेकर देखा है।
हम बस एक आम तमाशाबीन हैं।
चलिये दूसरे स्तिथि में मान लेते हैं कि आप हिम्मत दिखाते, पुलिस को फोन करते और घटना की सुचना देते।
और सोचते की पुलिस तुरंत आती और संबंधित घटना पर तुरंत कार्यवाही करेगी।
अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आपकी जानकारी के लिए बता दूं, ये हमारे भारत में सिर्फ एक भ्रम मात्र है।
यंहा मैं अपने एक प्रिय दोस्त के साथ हुई घटना का जिक्र करना चाहूंगा-
 मेरे मित्र की एक महिला मित्र के कुछ बिस हज़ार रुपये ग़ुम हो गए। सम्बंधित घटना को लेकर शिकातय (F.I.R) दर्ज कराने के लिए उस महिला ने मेरे मित्र से साथ पुलिस स्टेशन चलने का आग्रह किया। 
वहां पहुचने पर उन्हें करीब चार घँटे तक इंतजार करना पड़ा एक छोटी सी शिकायत दर्ज कराने के लिए, क्योंकि जब वो वँहा पहुचे तो थानाध्यक्ष मौजूद नहीं थे। और उनकी अनुपस्थिति में किसी ने भी शिकायत लेने से साफ़ मना कर दिया।
और जब शिकायत दर्ज हुई तो उसमें कुछ यूँ सवाल किए गए,

"जब आपके पैसे गायब हुए तो आपने किस रंग के कपडे पहने थे?
आप सुबह कितने बजे सो कर उठे थे उस दिन?"

अंत में तो ये तक पूछा गया की 
"आप किसके साथ शिकायत दर्ज कराने आयीं हैं?
इनका आपसे क्या रिश्ता है?
ये आपके क्या लगते हैं? (हँसते हुए)"

मुझे नहीं पता पुलिस किस तरह कार्य करती है लेकिन मुझे इस वाकये से इतना तो समझ आता है कि उनके लिए ये रोज की तरह ही एक और आम शिकायत थी, जिसका उनके लिए इसका कोई मतलब नहीं बनता।
पता है, हम वो मध्यमवर्गीय लोग हैं जिनका 'हम' उन्हें हमेशा सर झुका कर रहने के लिए धित्कारता रहता है, और जब वो सर उठा कर अपने अधिकार की बातें करने की कोशिश करता है तो उसे हमारा समाज बेदर्दी से कुचल देता है। 

यंहा मेरी 'पाकिस्तान' वाली बात से संबंध इस तरह है कि जब मेरा दोस्त और उसकी महिला मित्र शिकायत दर्ज कराने गये तो वो किसी दूसरे राज्य में थे। जहाँ की छेत्रिय भाषा उन्हें नहीं आती थी, जिस कारण उन्हें शिकायत दर्ज कराने के दौरान एक पाकिस्तानी के ही नजर से देखा गया।

3.

उस रात मेरे भी अंदर का जिम्मेदार नागरिक जाग उठा। मैंने बिना विलम्ब किये १०० पर फ़ोन किया, सामने से किसी महिला की आवाज आई,

"हेल्लो  ....पुलिस। कहिये क्या बात है?"

"जी मैं (अपना पता बताते हुए) यंहा रहता हूँ, और अभी अभी मेरे गली से एक ऑटोरिक्शा गुजरा है जिसमे से एक लड़की के चिल्लाने की आवाजें आ रही थी"

"आप कहाँ से बोल रहे हो? (जम्हाई लेते हुए)"

मैंने दुबारा अपना पता बताया।

"ठीक है।" (फोन कट)

मुझे समझ नहीं आया की ये क्या था? उसने मेरी बात सुनी भी या नहीं?
पांच मिनट बाद मेरा फ़ोन बजा..

"हाँ"

"हाँ मैं पुलिस बोल रहा हूँ आपने अभी १०० पर फ़ोन किया था"

"हाँ जी किया था"

"क्यों किया था? ऐसा क्या हो गया इतनी रात को?"

मै सवाल सुनकर थोड़ा झल्लाया।

"जी ऐसी ऐसी बात है (सारी बात बताई)"

"आप कहाँ रहते हो? इतनी रात को आप अपनी बालकनी में क्यों थे?"

मैंने फिर से सारी बात बताई।
उसके बाद उसने 'ओके' कहकर फ़ोन काट दिया।
फिर पांच मिनट के बाद एक कॉल आया, इस बार सामने वाला इंसान पूरी तरह झल्लाया हुआ था..

"क्या हुआ? क्यों कॉल किया इतनी रात को १०० पर? ऐसा क्या हो गया कि तुरंत पुलिस को फ़ोन लगा दिया तुमने?"

ऐसे सवाल सुनकर मेरा पूरी तरह दिमाग घूम चूका था। मैं अब एक ऐसे जगह पर खड़ा था जहाँ से मैं अपने पैर भी वापस नहीं खीच सकता था। जिस पुलिस से मै मदद की उम्मीद कर रहा था, अब उसी पुलिस से मुझे डर लग रहा था।

मैंने सारी घटना के बारे में दुबारा उसे बताया।

"तुम उस लड़की को जानते हो?"

"जी नहीं"

"वो तुम्हारी दोस्त है न?"

"जी??"

"हाँ, क्या रिलेशन है तुम्हारा उसके साथ?"

"जी मैं अपने घर में तीसरे माले पर रहता हूं, और जिस लड़की का मैं जिक्र कर रहा हूँ उसकी बस मैंने आवाज सुनी है मदद के लिए। आप कहाँ की बात कहाँ लेकर जा रहे हैं?"

"ऐ ठीक से बात करो, तुम उसे जानते हो न?"

"सर कैसी बातें कर रहे हैं आप? मैंने कितनी बार कहा कोई लड़की मदद के लिए चिल्ला रही थी उस ऑटो में, मैं तीसरे माले से उसे देख तक नहीं पाया और आप उससे मेरा संबंध जोड़ रहे हैं।"

"नहीं जानते तो फिर कॉल क्यों किया?"

मैं अब पूरी तरह सहमा और डरा हुआ था। मैं चुप था, कहाँ मैं किसी की मदद करने चला था और यंहा खुद थाने जाने की नौबत आन पड़ी।
सामने से आवाज आई...

"ठीक है, अभी मेरे बड़े साहब तुमको फ़ोन करेंगे।"

इस स्तिथि में मैं खुद को बिलकुल असहाय महसूस कर रहा था, क्योंकि न तो मैं अब फ़ोन ऑफ कर सकता था, और न ही कोई और फ़ोन उठाने की हिम्मत बची थी मुझमे। मैं बस खुद को कोस रहा था, क्या जरुरत थी एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक बनने की?
चुप चाप सो जाना चाहिए था, कौन सा वो मेरे घर की थी।

और सबसे बड़ी बात मैं भी एक अलग हिंदुस्तान में था। जहाँ मैं सिर्फ और सिर्फ एक पाकिस्तानी था।
और ये बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जितनी बार भी मैंने फ़ोन उठाया सबसे पहले मुझसे मेरी भाषा को लेकर सवाल किया गया।

खैर मै अब बस चुप चाप लेटा अपने बिस्तर पर बस ये सोच रहा था कि जितनी देर उन लोगो ने मुझे कॉल करके मुझसे एक ही सवाल पूछने और मेरा उस लड़की के साथ जबरदस्ती संबंध बनाने में लगाया, अगर उतनी देर में उन लोगो ने कुछ किया होता तो शायद वो लड़की उन्हें मिल गयी होती। 

फ़ोन फिर बजा, और इस बार मैं काँप रहा था।

मैंने फ़ोन उठाया, सामने से आवाज आई,

"हेल्लो, मै पुलिस बोल रहा हूँ, आपके ही गली में खड़ा हूँ बताइये क्या हुआ था?"

मैं किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहता था, सो मैंने वही चीजें जो पिछले आधे घंटे से दोहरा रहा था, फिर से बतानी शुरू की। मैं बताते बताते हकला गया।
सामने से बड़ी ही विनम्र आवाज आई..

"घबराइये नहीं, आराम से बताइये।"

मैंने पहली बार थोड़ा प्रोत्साहन पाकर सारी बातें विस्तार में कह दी।

"ठीक है, आपका बहुत बहुत धन्यवाद जानकारी देने के लिए। हम जल्द ही उस ऑटो वाले को पकड़ लेंगे।
थैंक यू"

पिछले आधे घँटे में मुझे पहली बार लगा की मैंने कोई गलती नहीं की पुलिस को फ़ोन लगा कर। फिर भी घबराहट में मैंने खुद की तस्सली के लिए पूछा..

"धन्यवाद सर, क्या मैं अब सो सकता हूँ?"

"जी बिलकुल, आप निश्चिन्त होकर सोयें"

मेरी सांस में सांस आयी की हाँ मैं अब कम से कम सुरक्षित हूं, मैं किसी पचड़े में नहीं फंसा।

कहने का तातपर्य ये है कि आप अपने घर वालों को छोड़ कर बाहर किसी पर भरोसा करते हो तो वो है 'पुलिस'। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या पुलिस आपको अपने परिवार की तरह देखती है?
मेरे हिसाब से "नहीं"। इस घटना के बाद से तो बिलकुल नहीं, और मैं ये भी दावे के साथ कह सकता हूं कि उस रात अगर उस एक "समझदार" पुलिस अफसर ने फ़ोन नहीं किया होता तो शायद ये सब मैं जेल में बैठ कर लिख रहा होता।

अंततः बात यंहा आकर रूकती है कि क्या आप इस हिंदुस्तान में सुरक्षित हो?
ये सिर्फ दूसरे राज्यो में ही नहीं आपके अपने खुद के राज्य में भी आपके साथ हो सकता है। आप जिस पुलिस पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हो, उसी से आपको डर भी लगता है।

तो फिर हम कहाँ सुरक्षित हैं?
"कही नहीं"
क्योंकि हम सब पाकिस्तानी हैं।
और मुझे अपने जीवन में हुई इस घटना से इतनी सिख मिली है कि अगली बार मै अगर सड़क पर किसी की इज्जत उतरते हुए भी देखूं तो आँखे मूँद लूँगा, और अपने अंदर जाग रहे उस जिम्मेदार नागरिक को कुचल कर मार दूंगा।

(सारी घटनाएं सत्य हैं)
 


तारीख: 15.07.2017                                                        अंकित मिश्रा






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