सफर

बैठे बैठे कमर अकड़ चुकी है, लेकिन सफर अभी बहुत बाकि है। गर्मियों के मौसम का सफ़र बड़ा अजीब सा होता है, चिपचिपाहट, पसीना, झल्लाहट, आस पास बैठे लोगो के बनियान से आती सडियल महक। फिर भी जो सफ़र का आंनद इन खुली खिड़िकियो से आती गर्म हवाओ को सहने में है वो बंद शीशो में ऐसी की ठंढी हवाओ में नहीं।

इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे की आपके साथ सफ़र कर रहे लोग, जिनसे आप आमतौर पर नहीं मिलते। अब मेरे ही अगल बगल के वातावरण को देखिये, सामने बैठी औरत के गोद में एक बच्चा है जो की बिलकुल ही असहाय नजर आता है जब से मै अपनी जगह पर आया हूँ वो अपनी माँ के ही गोद में है, वो अपनी गरदन सीधी करने में आसमर्थ्य है। और उसकी माँ ने अपने सर पर जितनी बड़ी बिंदी लगायी है उससे कही बड़ा उस बच्चे के सर पर काजल का काला टीका लगा दिया है। शायद नजर लगने के ही कारन ऐसा हुआ हो।

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आप सोच रहे होंगे ऐसे सफ़र में क्या मजा आएगा किसी को, तो आप बिलकुल गलत हैं, यंहा ऐसे लोग भी हैं जिनके पास मनोरंजन का कोई साधन तो नहीं लेकिन आपका भरपूर मनोरंजन करा सकते हैं। अब मेरे बगल वाले भाई साहब को ही ले लीजिये, जब मै आया तो ये सो रहे थे लेकिन अब जाग चुके हैं और पूरी तरह जाग चुके है। इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं की इन्होंने उठते ही सबसे पहले चुटकी के पुल्लिंग रूप "चुटका" भर खैनी लेकर मुँह में दबाई है और अब सीट को थपथपा कर किसी गाने को अपनी थूक भरी लय प्रदान कर रहें हैं। और रह रह कर अपनी थूकने की कला में महारत हासिल कर चुके विद्या का भरपूर इस्तेमाल करते हुए बीच की सीट से बैठे बैठे "पिच" की आवाज के साथ सीधे खिड़की के बहार निशाना लगा रहें हैं।

एक और हैं भाईसाब, जिन्हें अपने कान पर उगे बालों से खुन्नस है। ये उन्हें इतनी बेदर्दी से उखाड़ रहें हैं जैसे इनकी जाती दुश्मनी हो, और उन्हें उखाड़ने के पश्चात ये उन्हें बड़े ही प्रेम से निहारते हैं और फिर कुछ फुसफुसाते हैं। और हाँ ये फेंकते नहीं हैं उन्हें, ना बिलकुल ना, ये बड़े ही प्यार से उसे अपने कागज की किसी पुड़िया में बटोर रहे हैं जिनमे न जाने पहले से कितने ही बाल हैं।

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माफ़ कीजियेगा सो गया था, लेकिन निचे की सीट पर बैठे उपद्रवी बच्चे ने कोई कसर नहीं छोड़ी मेरी नींद ख़राब करने में। आइस क्रीम की खातिर इतने बेहतरीन तरीके से आंसुओ का सम्मेलन करते हुये जी जान लगा कर गाला फाड़ फाड़ रोया है की मेरी नींद क्या, स्वयं भगवान विष्णु भी अपनी निद्रा से जाग जाएं।

खैर अच्छी बात ये है की बारिश होने लगी है, और मैं बहुत ही आत्मविश्वास और अनुभव से कह सकता हूँ की इस पल का आनंद आप ऐसी वाले डब्बे में तो बिलकुल ही नहीं ले पाते। अब रात हो चली है और दिनभर की सड़ी गर्मी के बाद शाम की बारिश से भीग कर मौसम ठंढी साँसे ले रहा है। कल सुबह के साथ ये सफ़र भी खत्म हो जाएगा, लेकिन फिलहाल मुझ जैसे इंसान की आँखों में इतनी जल्दी नींद नहीं बसती। सबसे ऊपर की सीट पर लेटा लेटा इस "लौहपथ गामिनी" की गति के अनुपात में झूल रहा हूँ। वैसे ही जैसे बचपन में माँ अपनी गोद में लेकर झुलाया करती थी। ये सब कुछ एक लोरी की तरह होता जाता है धीरे धीरे आँखों में नींद तैरने लगती है, और इस पल के सुख की अनुभूति की कोई व्याख्या नहीं की जा सकती।

ठहरिये ठहरिये, ज्यादा भावनाओ में न बहिये और अभी कैसे सो सकते हैं आप? अभी तो सबसे महत्वपूर्ण काम बाकि है। सबसे पहले बिलकुल ही तेज पुरुष की तरह सुबह चार बजे का अलार्म लगाइये, ताकि सुबह लाइन न लगाना पड़े दीर्घशंका के लिए। विश्वास कीजिये अगर ऐसा आप कर लेते हैं तो आप सुबह उठ कर खुद को जंग जीता हुआ महसूस करेंगे।

एक बात और जंग जितने की खुमारी में बोतल में पानी ले जाना न भूलियेगा नहीं तो लेने के देने पड़ सकते हैं। यह बिलकुल हवाई जहाज़ में दिए जाने वाले आपातकालीन पैराशूट की भांति काम करता है। फ़िलहाल के लिए शुभ रात्रि।

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सुप्रभात।

वैसे किसी ने ठीक ही कहा है "ज्ञान जरा कम बाटों"। लेकिन जिसने मुझसे ये कहा था उसका आखिरी शब्द कुछ और था। खैर क्या फर्क पड़ता है, फ़िलहाल मैं आपको ज्ञान देने के फलस्वरूप जंग हारकर खड़ा हूँ सिपाही की तरह अपना ";पैराशूट" लिए हाथ में चौथे नंबर पर और जंग के मैदान की विभत्सा की कल्पना कर रहा हूँ।

आह!!!!!!! जंग के मैदान में तो मुझसे पहले ही कई सिपाही कहर मचा चुके हैं, और मैंने हथियार डाल दिया है। मै वापस आ चूका हूँ बेसिन के पास और चेहरा धोने की कोशिश कर रहा हूँ, कोशिश इसलिए क्योंकि यंहा भी थूकबाजो ने गुटको की मदद से जबरदस्त स्प्रे पेंट का नमूना पेश किया है। और मैं बिलकुल नहीं चाहूँगा की ये ताजा ताजा पेंट मेरे हाथो में लगे।

मैंने हमला तो नहीं किया लेकिन इस जंग से लौटे सिपाही को भूख लग गयी है, और इस वक़्त में काम आते हैं मेरी सजीव बुद्धि का इस्तेमाल कर लिए हुए मद्रासी केले।

उसके बाद आपके साथ के लिए बहार "ऐं चायं चायं, गर्म चायं" की कई केतलिया घूम रही हैं आप जिसे चाहे उसे बुला कर इस सुविधा का इस्तेमाल कर सकते हैं। और हम भारतीयों की तो राष्ट्रीय पेय है चाय, हम चाहे कितनी भी गर्मी में हो लेकिन कोई एक ग्लास ठंढे पानी के बाद अगर हमसे चाय पूछ दे तो हम न नहीं करते, हम बड़े इज्जत के साथ पसीने पोछते हुए उसकी चुस्किया लेते हैं। और देखिये कितना बेहतरीन नजारा है खिड़की के बहार, पहाड़ो को अपने लाली में रंगता हुआ उगता सूरज। इन्ही खूबसूरत नजारों की वजह है इन स्लीपर बोगियों में यात्रा, और बेशक इसका लुत्फ़ आप कहीं और नहीं उठा सकते।

सफ़र अब ख़त्म होने को है और हर तरफ लोग अपने अपने सामान को व्यवस्थित करने में लगे हुए हैं। सबके मन में एक उल्लास उभर आया है और सब पिछले पंद्रह घन्टे के लंबे और चिपचिपे सफ़र को भूल चुके हैं। सबके पास अपनी अपनी यादें हैं इस सफ़र की, कुछ जंग जीते सिपाही, कुछ निशानेबाज चचा लोग, और मेरे लिए सबसे अलग वो असहाय बच्चा जो की अब भी उसी प्रकार अपनी माँ के गोद में लेटा हुआ है। लेकिन उसकी माँ ने उसका टीका और गहरा कर दिया है। शायद यही कारण हो......

फिलहाल मैं सीना चौड़ा कर कंधे पर अपना बैग लिये ट्रेन से कूद पड़ा हूँ और बड़ा ही हल्का महसूस कर रहा हूँ। नहीं नहीं वो "हल्का" नहीं, वो अभी बाकी है। हर सफ़र की तरह इस सफ़र के ख़त्म होने के बाद भी बस एक ही चीज़ रह गयी है कानो में, "ऐं चायं चायं, गर्म चायं..."।


तारीख: 07.06.2017                                                        अंकित मिश्रा






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