कुछ शब्द इनके भी-अभिलेख द्विवेदी

अभिलेख द्विवेदी साहित्य जगत में कोई अनजान नाम नहीं है| काफी वक़्त से लिखते आ रहे हैं| फ्रीलांसिंग भी करते हैं और रेडियो के लिए भी लिखते हैं| इसके अलावा कई ऑनलाइन एवं प्रिंट मैगज़ीन के लिए भी लिख चुके हैं | "कुछ शब्द इनके भी" की अगली कड़ी में हमने बात की अभिलेख जी से:

अपने बारे में हमारे पाठकों को कुछ बताएं| प्रारंभिक जीवन, अभी क्या कर रहे हैं, पसंद नापसंद इत्यादि।


मैं आप सब जैसा ही आपके बीच में पला बढ़ा एक वो इंसान हूँ जो अपनी एक अलग पहचान बनाने में लगा हुआ है।मेरा जन्म कलकत्ता में हुआ था तो साहित्य और कला से जुड़ाव जन्म से ही था। पढ़ाई लिखाई तो मैंने बस जैसे तैसे की क्योंकि स्कूल के किताबों से ज़्यादा मुझे, कॉमिक्स, चित्रकारी, संगीत में ज़्यादा मन लगता था। किताबों का शौक शुरू से रहा। घर में काफी सारे धार्मिक किताबें और ग्रंथ हैं तो वो भी पढ़ता था। कॉमर्स से ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने लिखने के तरफ ध्यान देना शुरू किया। क्योंकि उसके पहले मुझे क्रिकेट ने व्यस्त रखा हुआ था। मुझे आज भी क्रिकेट देखने से ज़्यादा खेलना पसंद है लेकिन अब मौके नही इसलिए सिर्फ लिखना, पढ़ना और घूमना पसंद है। एक रेडियो स्टेशन में नौकरी करता हूँ तो कह सकता हूँ कि लिखने के लिए अब पैसे मिलते हैं। मुझे लोगों से मिलना भी बहुत पसंद है क्योंकि मुझे लिखने के लिये आईडिया मिल जाता है|

 "ख्यालों का अभिलेख" क्या है और इसमें हम किस तरह की कवितायेँ पढेंगे?


ख़यालों का अभिलेख औरों की नज़र में एक काव्य संग्रह है लेकिन मेरे नज़र में यह पूरा अब तक का सफ़र है जिसे मैंने लफ़्ज़ों में उकेरा है। मेरे तमाम अनुभव, सोच, से सराबोर बातें है इसमें। मसलन एक कविता ऐसी है जो मेरे नाम के हिंदी अक्षरों पर है और उन अक्षरों के माध्यम से मैंने खुद का चरित्र गढ़ने की कोशिश की है। सेल्फी, स्कूल सब्जेक्ट्स से लेकर कई बातें है जिन पर मनोवैज्ञानिक नज़रिये के अलावा एक आम नज़रिया भी पढ़ने को मिलेगा। हाँ, अवसाद,तन्हाई, एकाकी शायद ज़्यादा मिले, लेकिन आजकल की जीवन शैली ही ऐसी है तो हर किसी का अनछुआ पहलू इसमे है।

 हिंदी साहित्य से जुड़ाव कब और कैसे हुआ| किन कवियों को पढ़ते हैं और कौन से लोग/साहित्यकार प्रेरणा स्रोत बने|


हिंदी साहित्य से जुड़ाव मुझे स्कूल के समय से ही हो गया था। नहीं, स्कूल की किताबों से नही, राज और डायमंडकॉमिक्स के किरदारों के वजह से। नंदन, चम्पक, चन्दामामा, सुमन सौरभ के अलावा सरिता, कादम्बिनी, जैसे पत्रिकाओं को भी पढ़ता था। बंगाल के वजह से राबिंद्रसंगीत और नज़रुलगीत से भी कुछ प्रेरणा मिली और हिंदी के लिए मैंने सभी बड़े कवि जैसे निराला, माखनलाल चतुर्वेदी, अज्ञेय आदि कवियों से प्रेरणा ली। इंग्लिश के लिए स्कूल के किताब काफी थे।लेकिन मुझे शुरू से उर्दू के तरफ रुझान रहा और ग्रेजुएशन के बाद साहिर लुधियानवी, फ़राज़, परवीन शाकीर, अकबर इलाहाबादी, फ़िराक़ गोरखपुरी, कैफ़ी आज़मी, आदि मेरे प्रेरणास्त्रोत बने रहे।

आप कई सालों से साहित्य से जुड़े हुए हैं| कई सम्मिलित प्रकाशन, कई प्रिंट एवं ऑनलाइन पत्रिकाओं के लिए भी लिख चुके हैं | तो अपनी कविताओं का संग्रह प्रकाशित करवाना पुराने सारे किये कामों से अलग क्यों/कैसे है|


दरअसल लिखना एक सफर जैसा होता है, शुरआत में कौतूहल होता है, एक जुनून होता जो बेचैन रहता है लेकिन हर बार के सफर के कुछ बाद एक ठहराव आने लगता है, परिपक्वता आने लगती है तो बस इन्हीं कारणों से ऐसा किया।पाठक हर बार आपसे कुछ नया खोजेगा इसलिए ज़रूरी है आप दुहराव न लाएं। मेरे लिए हर रचना नयी हो सकती है लेकिन एक पाठक के लिए नही। मैं अपनी हर रचना लिखने के बाद एक पाठक की तरह कई बार पढ़ता हूँ और देखता हूँ कुछ नया लिखा या नहीं। इंस्टा के दौर में पन्ने पलटवाना है तो विविधता ज़रूरी है।

हम कई लोगों को जानते हैं जो सालों से ऑनलाइन माध्यम से साहित्य से जुड़े हैं और उनकी एक खास fan-following भी है| लेकिन अमूमन लोग आपको संजीदगी से तभी लेते हैं जब आपके पास दिखने के लिए कोई प्रकाशित पुस्तक हो| क्या आपने भी ऐसा कुछ अनुभव किया है? और आपके अनुसार इस सोच की वजह क्या है?


हाँ, ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ है। लोगों को देखा भी है वो अपने परिचय से पहले अपने किताब का ज़िक्र करने लगते हैं। मुझे याद है कि जब एक ओपन माइक में उन लोगों की ज़्यादा कद्र की गई जिनकी किताबें आ चुकी थी, लेकिन वहीं उनसे बहुत अच्छे लेखक और वक़्ता भी थे जिन्हें ज़्यादा तवज्जो नहीं दिया गया। और अमूमन लोग यह सोचते हैं कि लेखक है तो खुद की किताबें लिखी होंगी। इस सोच की वजह बदलते दौर का दिखावापन है जो हावी है। और बाज़ार में आजकल दिखावा ही बिकता है। अब तो स्पोकन वर्ड के वायरल वीडियो का दौर है वैसे। आज अंग्रेज़ी से लेकर हिंदी साहित्य में, लोग कुछ भी लिख कर प्रकाशित हो जाते हैं, सिर्फ दिखाने के लिए, उनको साहित्य से कोई लेना देना नहीं है। लेखन एक तपस्या जैसी है लेकिन बाबाओं के ऐसे रंग ढंग हैं तो क्या कहा जाए।

अमूमन कोई भी कवि अपने फ्रेंड सर्किल में मशहूर होता है | अलग अलग मौकों पर उससे कोई कविता सुनाने की मांग की जाती है| क्या आपके साथ भी ऐसा होता है? इस सम्बन्ध में यदि कोई रोचक घटना घटी हो तो कृपया हमारे पाठकों के साथ साझा करें|


बहुत पहले होता था ऐसा जब मैं रुमानियत ज़्यादा लिखता था। अक्सर तब फरमाइश होती कि आज इस मौके पर या इस शक़्स के लिए कुछ कहो, तो कर देता था। कुछ का ब्रेक अप करवा देता था और कुछ के नज़र में दिलफेंक बन जाता था। अब संजीदगी ज़्यादा लिखता हूँ तो फरमाइशें नहीं होती लेकिन उनकी उम्मीद और अपनी कोशिश यही रहती है कि कुछ अच्छा, नया और यादगार सुनाऊं।

एक वक़्त था जब देश भर में हिंदी रचनाकारों को पढ़ा/ सुना जाता था| फिर एक वक़्त ऐसा भी आया कि युवा वर्ग हिंदी पढने से कतराने लगा| अंग्रेजी किताबें पढना एक फैशन सा बन गया था| आज भी लगभग वैसे ही हालात हैं किन्तु धीरे धीरे हिंदी साहित्य की तरफ युवा लौट रहे हैं| आपके विचार में हिंदी साहित्य की ऐसी गति क्यों हुई और हिंदी रचनाकारों को युवा पाठकों से जुड़े रहने के लिए क्या करना होगा?


सबसे बड़ा कारण है हमारी शिक्षा पद्धति। आपको आश्चर्य होगा यह जानकर कि हिंदी के अलावा तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती में भी कवि हुए जिन्हें नज़र अंदाज़ किया जा रहा है। मेरा यह मानना है आप पढिये, सीखिए हर भाषा मे लेकिन अपनी मातृभाषा को नज़रअंदाज़ मत करिए। मैंने खुद आज़माया है कि अगर आप अच्छा लिखेंगे तो लोग आपसे जुड़ेंगे और वो भी उसे अपनायेंगे। इसलिए हिंदी लेखकों को यह समझना होगा कि बदलते दौर की ज़रूरत क्या है, दूसरे भाषाओं से सीखिए, उनसे तुलना या उनकी नकल मत करिए। भेड़चाल छोड़कर एक छाप छोड़ने के लिए लिखिए। आज के दौर में भी प्रेमचंद, जॉन एलिया, मजाज़, निर्मल वर्मा के किताबों को लोग आत्मयिता से पढ़ रहे हैं इसलिए हिंदी लेखकों को यह समझना होगा कि "स्वाइप राइट या लेफ्ट" नही लिखना है, "टू बी और नॉट टू बी" की गहराई को समझकर, समाज की बात न कि मन की बात, हिंदी में कहना है।

टेक्नोलॉजी, खासकर सोशल मीडिया आज के रचनाकारों के लिए एक वरदान सा बन गया है| आप किस हद तक सोशल मीडिया से जुड़े हैं और उसे अपने पाठकों से जुड़ने का माध्यम बना रहे हैं|

यह सच है कि सोशल मीडिया एक वरदान साबित हुई है और पाठकों तक जुड़ने के लिए इससे बड़ा कोई सहारा नहीं। मेरे भी फेसबुक के अलावा, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर प्रोफइल है लेकिन मैं इंस्टा और फेसबुक पर ज़्यादा सक्रिय रहता हूँ। मैं सोशल मीडिया पर बहुत ज़्यादा और हर वक़्त नहीं लिखता क्योंकि वहां मौलिकता नहीं होती। हाँ पाठकों से जुडे रहना और पाठकों में इज़ाफ़ा करने के लिए हर बार कुछ अच्छा और नया लिखने की कोशिश करता रहता हूँ। इन दो के अलावा कुछ लेखन के लिए एप्प्स पर भी प्रोफाइल है। मुझे लोगों से जुड़ने का वैसे भी अच्छा लगता है। 

हमारे पाठकों को क्या सन्देश देना चाहते हैं? खासकर ऐसे पाठक, जो आगे चलकर लेखन की दुनिया में आगे बढ़ना चाहते हैं|


मैं यह कहूँगा की हिंदी साहित्य पर उतना ही भरोसा रखिये जितना आपको अपनी माँ पर होता है। जन्म से लेकर अंतिम सांस भी आपकी मातृभाषा आपकी ही रहेगी। साहित्य मंजरी ने जो कदम उठाया है वो आगे की पीढ़ी के लिए है। एक ऐसी नींव रखी है साहित्य मंजरी ने की हर हिंदी साहित्य प्रेमी रोम रोम से आशीर्वाद देगा। कदम सराहनीय है इसलिए सभी लेखक और पाठकों से कहूँगा, साहित्य मंजरी का हौसला बढ़ाएं और हिंदी साहित्य को आगे लाएं। लिखने के लिए ज़रूरी है ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ना, रोज़ एक चैप्टर ही पढिये, कहीं से भी कुछ भी पढ़ने की आदत डालिये फिर लिखने में धार अपने आप आएगा। मेरी यही प्रार्थना है भविष्य में हिंदी साहित्य ही हर तरफ़ नज़र आये। 

हमसे बातचीत करने के लिए धन्यवाद|


आपका शुक्रगुज़ार हूँ साहित्य मंजरी। शुभकामनाओं सहित आभारी,
 


तारीख: 31.10.2017                                                        साहित्य मंजरी






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