रंगों में बेरंग

कई बार ऐसी कवितायेँ तो कुछ ही शब्दों से बनी होती हैं, आपको सोचने पर सबसे अधिक मजबूर करती हैं | फ़ैज़ान ख़ान की “रंगों में बेरंग” ऐसी कई कविताओं से भरी हुई है| 
“रंगों में बेरंग” हिन्द युग्म के द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह है| संग्रह में कुल 52 कवितायेँ हैं, जो अलग अलग भावों को खुद में समेटे हुए हैं| यदि संग्रह का सार बताना हो तो शायद कवि की “मैं” से मुलाकात, इस मुलाकात के दौरान हुई यात्रा एवं इस मुलाकात के प्रभाव को ही इन कविताओं के जरिये दर्शाया गया है| संग्रह  की एक ख़ास बात है इसकी भाषा ( हालाकि बहुत सारे old-school साहित्य प्रेमियों को भाषा से ही नाराज़गी भी होगी)| अक्सर हम बोलते कुछ और हैं और बोलते कुछ और, लेकिन फ़ैज़ान जी ने लगभग उसी भाषा में लिखा है जो हम आम बोल-चाल में प्रयोग करते हैं| कविता में हिंदी-उर्दू के साथ साथ अंग्रेज़ी के वाक्य भी हैं| यहाँ तक की आम बोली में प्रयोग होने वाली गालियों से भी परहेज़ नहीं किया गया है
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Rango me Berang book review
“ थमेगा तुम्हारा हाथ
और कहेगा
अबकी बार ये चूतियाप मत करना”

इस संग्रह की कवितायेँ छंद-बद्ध नहीं हैं| कवितायेँ ऐसी बिलकुल नहीं हैं जिन्हें आप बार बार गुनगुनाया जा सके| कुछ कवितायें बहुत सादी सी हैं, जिनमे दुबारा नहीं पढेंगे आप| कई बार लगता है कि इन कविताओं को बस लिखने के लिए लिख दिया गया है| इसकी वजह ये हो सकती है की कवि ने अपने जिन अनुभवों को इन कविताओं में उतरा है, उनसे हम इत्तेफाक नहीं रखते हों या उनको कभी महसूस न किया हो | 
इन कविताओं की एक ख़ासियत है| कुछ कविताओं के भाव काफ़ी गहरे हैं| शायद आपको आराम से, वक़्त निकाल कर, शायद एक-दो बार पढना पड़े तब शायद आप इन कविताओं के मर्म को एवं इसको लिखते समय कवि की मनोदशा को समझ पायें| कविताओं में कवि ने घिसे-पिटे मानकों से ऊपर उठ कर नए मानकों एवं उपमाओं को अपनाया है| कभी कवि “मैं” से बात करता है, कभी पतंग को अपनी ज़िन्दगी बताता है, तो कभी कुत्ते और इंसान में तुलना करता है|
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“मैं पैरों तले जलने लगा था 
महक इतनी बढ़ी 
कि किसी का दस्तक देना लाज़मी हो चला था
वो तो शुक्र मनाओ उनका
जिन्होंने अपने दुपट्टे से उस सीटी को नीचे कर दिया
वर्ना क्या क्या होता?
जब वो कूकर सीटी से जुदा होता
वैसे जले हुए चावल लगते बड़े लज़ीज़ हैं”

कुल मिलकर संग्रह की कई कवितायेँ ऐसी हैं जो आप पर अपना असर छोड़ जाएँगी| हमारी सलाह है की कभी अकेले आराम से छत पर या किसी समंदर के किनारे बैठकर इस किताब को पढ़े, बहुत अच्छा लगेगा|


तारीख: 16.12.2017                                                        कुणाल






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