मैं हक़ीक़त में था उसके या था उसके ख़्वाब में

मैं हक़ीक़त में था उसके या था उसके ख़्वाब में

आग़ाज़ से ही कमज़ोर था मैं दिल के हिसाब में।

 

यूँ तो हर बात में उसकी कोई एक बात होती थी

मैं फ़क़त ढूंढ ना पाया सवाल उसके जवाब में।

 

 राब्ता नाजाने कितने दिलों का उसके दिल से था

एक मेरा ही नाम शुमार न था उसकी किताब में।

 

उसकी आदत-ए-बेरुख़ी ने मुझे गुमशुदा कर दिया

मैं दश्त-ए-तसव्वुर में मिला हाल-ए-इज़्तिराब में।

 

मुराद-ए-क़ुर्बत ही दिल की आख़िरी ख़्वाहिश थी

पर तक़दीर मेरी थी ऐसी तू मिली बस सराब में।

 

तोहमत-ए-इश्क़ फ़क़त एक तेरी ही जायदाद नहीं

मैं भी शायद कमज़ोर ही था इश्क़ के निसाब में।


तारीख: 04.05.2020                                                        जॉनी अहमद क़ैस






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