सर अपना पत्थर पे मार रहा हूँ

सर अपना पत्थर पे मार रहा हूँ

रोज़ खुद को ही सुधार रहा हूँ ।

 

वक्त माँग रहा हरपल सांसे मेरी

कर्ज ज़िंदगी की मैं उतार रहा हूँ ।

 

पढ़ लेता है हर कोई चेह्रे से मुझे

सबके के लिए मैं अखबार रहा हूँ ।

 

अजीबोगरीब है शख्सियत मेरी

औरों को फूल ,खुद खार रहा हूँ ।

 

मसअले मुझपे मेहरबाँ रहे हमेशा

अजय मैं उनका शुक्रगुजार रहा हूँ ।


तारीख: 25.05.2020                                                        अजय प्रसाद






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