ठिकाना तेरे दिल के अंदर

ठिकाना तेरे दिल के जो  अंदर हुआ 

हार  दिल को मैं अपने सिकंदर हुआ 

 

तूने ग़म में मेरा हाथ पकड़ा है यूँ 

तीरगी में दीया इक मयस्सर हुआ 

 

कामयाबी मिलेगी, तुम चलते रहो 

एक दरिया भी देखो समंदर हुआ 

 

अगले इतवार को मिलने आएगी वो 

मौत का दिन मेरे अब मुक़र्रर हुआ 

 

भूख से हार जाती है इंसानियत 

खेल ये इस जहाँ में है अक्सर हुआ 

 

तेरे जाने का मुझपर है ऐसा असर 

मुक़द्दर भी मुझ से मुकद्दर  हुआ 

 

मेरी ग़ज़लों में तख़ल्लुस ढूँढो नहीं 

दोस्तों, आज से मैं क़लंदर हुआ 

 

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शब्दार्थ 

 

तीरगी- अँधेरा 

मयस्सर- उपलब्ध 

मुक़द्दर- क़िस्मत 

मुकद्दर-मैला, अप्रसन्न, नाखुश 

तख़ल्लुस-कवि का वह नाम जो वह अपनी कविता में लिखता है, उपनाम ।

क़लंदर- फ़क़ीर, सन्यासी 


तारीख: 14.07.2020                                                        कुणाल






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