या रब कुछ तो आसान कर

या रब कुछ तो आसान कर
दुनिया गमों से सुनसान कर ।


ज़िंदगीयाँ हैं जिनकी बेरहम
उनको अपना मेहमान कर ।


रोने को अब आसूँ भी नहीं
आंखों पर भी एहसान कर ।


मेरी तो कोई सुनता ही नहीं
ज़ारी तू अच्छी फरमान कर ।


जैसे अता की है खुबसूरती
खुबसूरत और ये जहान कर ।


थक चुके हैं लोग इवादत से
कुछ तो इधर भी ध्यान कर ।


कब तलक रहेगा यही चलन
अब तो धरती आसमान कर ।


तारीख: 21.07.2020                                                        अजय प्रसाद






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