लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में

 

bahadur shah zafar

 

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में।

किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में।

 

बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला,

किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में।

 

काँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँ 

ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में 

 

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,

इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में।

 

इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां,

कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लालाज़ार में।

 

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन,

दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में।

 

दिन जिंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई,

फैला के पाँव सोयेंगे कुंजे मज़ार में।

 

कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिये,

दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।

 

 

                                                   zafar during jail in rangoon

 

मिर्ज़ा अबुल मुज़फ़्फ़र मोहम्मद सिराजुद्दीन उर्फ़ बहादुर शाह ‘ज़फ़र’ का जन्म 24 अक्टूबर 1775 को दिल्ली के लाल क़िले में हुआ | 1857 में जब हिंदुस्तान की आज़ादी की चिंगारी भड़की तो सभी बाग़ी सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने ज़फ़र को हिंदुस्तान का शहंशाह माना और उनकी अगुवाई में अंग्रेजों से टक्कर ली, जिसे अंग्रेजों ने ग़द्दारी और बाग़ीपन क़रार दिया। इस मुख़ालिफ़त के मद्देनज़र ज़फ़र को अंग्रेज़ों से बचने के लिए हुमायूँ के मक़बरे में पनाह लेनी पड़ी, जहाँ से आख़िरकार अंग्रेज़ी फ़ौज ने उन्हें, उनकी बेगम ज़ीनत महल और बच्चों के साथ गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया। ज़फ़र को इस बीच बड़ी तक़लीफ़ और फ़ज़ीहत से गुज़रना पड़ा। इन तक़लीफ़ों का सुन के ही कलेजा मुँह को आता है। इनके तीन बेटों और एक नाते का सर क़लम कर दिया गया और उनके कटे सरों को लंबे वक़्त तक नुमाईश के लिए रखा गया। अपनों और दूसरे बाग़ियों की शहादत, अंग्रेज़ों से मिली ज़िल्लत और 42 दिन चले गद्दारी के मुकदम्मे के बाद इन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई जिसे बाद में उम्र क़ैद में तब्दील कर दिया गया। 1858 में इन्हें बेगम ज़ीनत महल, दो बच्चों और बहू के साथ रंगून जेल भेज दिया गया। ज़िन्दगी के आख़िरी चार बरस इन्होंने यहीं बड़ी दुश्वारी और ज़िल्लत में काटे।

1862 में 87 साल की उम्र में कहा जाता है के ज़फ़र को कोई शारीरिक बीमारी हुई थी। 1862 के अक्टूबर महीने में उनकी हालत इतनी ख़राब हो गई के चम्मच से ही खाना खा पाते थे, 3 नवम्बर के बाद से चम्मच से खाना खिलाना भी मुश्किल हो गया। 6 नवम्बर को ब्रिटिश कमिश्नर एच.एन. डेविस के मुताबिक़ ज़फ़र को लकवा हो गया था और 07 नवम्बर 1862 को इनका इंतेक़ाल हो गया।

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तारीख: 11.07.2020                                                        बहादुर शाह ज़फ़र






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