वो ग़ज़ल जिसने ग़ालिब की जान बचा ली

मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें जितनी ख़ूबसूरत होती हैं, उतने ही दिलचस्प होते हैं ग़ालिब के क़िस्से। ग़ालिब के सबसे बेहतरीन ग़ज़लों की सूची बनायी जाए तो उसमें वो ग़ज़ल ज़रूर शामिल होगी जो इस मतले से शुरू होती है 

इस ग़ज़ल की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। बात तब की है जब ग़ालिब उतने अधिक मशहूर नहीं थे। एक बार ग़ालिब बाज़ार में बैठे कुछ दोस्तों के साथ गप्पें लड़ा रहे थे तभी वहाँ से शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ की पालकी गुज़री। ज़ौक़ साहब उस वक़्त के सबसे मशहूर शायर थे। एक तो वो एक अच्छे अदीब उसपर से मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र (जो ख़ुद एक आला दर्जे के शायर थे) के उस्ताद। 

ख़ैर, जब ज़ौक़ साहब वहाँ से गुज़रे तभी ग़ालिब ने कहा 

“ हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता”

संयोग से ये ज़ौक़ साहब ने सुन लिया। उन्हें ग़ुस्सा तो बहुत आया पर वो सीधे महल चले गए। ये बात उन्होंने बादशाह को बताया। बादशाह को भी अपने उस्ताद की इस बेज़्ज़ती पर बहुत ग़ुस्सा आया। उन्होंने कहा कि अगले इतवार को एक मशायरा करवाया जाए जिसमें ग़ालिब को भी बुलाया जाए।

अगले इतवार को मशायरा शुरू हुआ कि  तभी बादशाह ने ग़ालिब से पूछ लिया-

“ग़ालिब साहब! सुना है आप उस्ताद ज़ौक़ साहब का सड़क चलते मज़ाक़ उड़ाते हैं। आपने इन्हें कहा कि हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता?”

अब ग़ालिब को समझ में ही ना आए कि  क्या करे। ज़ौक़ साहब ने सुन लिया तो झुठला सकते नहीं और सच बोलने पर क्या सज़ा मिलती कोई नहीं जनता। आख़िर बादशाह के उस्ताद की बेज़्ज़ती हुई है। लेकिन ग़ालिब ने चतुराई दिखाते हुए कह दिया 

“जनाब मैं उस्ताद का नहीं ख़ुद का मज़ाक़ बना रहा था। जो ज़ौक़ साहब ने सुना वो तो बस मेरी एक ग़ज़ल के मकते का पहला मिसरा  है। पूरा शेर तो ये है 

 

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता 

वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है “

 

ग़ालिब को लगा बच गए लेकिन बादशाह तो बादशाह ठहरे। उन्होंने कहा कि जब मकता इतना ख़ूबसूरत है तो पूरी ग़ज़ल ही सुना दीजिए। ग़ालिब मना  कर नहीं सकते थे। उन्होंने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाली और ये ग़ज़ल पढ़ने लगे 

 

 

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है 

तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है 

 

न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा 

कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है 

 

ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से 

वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है 

 

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन 

हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है 

 

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा 

कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है 

 

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल 

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है 

 

वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़ 

सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है 

 

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार 

ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है 

 

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी 

तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है 

 

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता 

वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है 

 

अब इस ग़ज़ल को सुनने के बाद ग़ालिब की बात मानने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया था। ये थे ग़ालिब जो मौक़े पर, बिना किसी तैयारी के एक इतनी ख़ूबसूरत ग़ज़ल कह सकते थे। तभी तो कहते हैं 

 

“हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे 

कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और “

 

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शब्दार्थ:

 

अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू- बात करने का तरीक़ा 

शोख़-ए-तुंद-ख़ू- शरारती ख़ूबसूरत 

रश्क- जलन 

ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू- दुश्मन द्वारा ग़लत बात बताने का डर 

बहिश्त -जन्नत 

बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू- कस्तूरी की सुगंध वाला गुलाब युक्त शराब 

मुसाहिब - साथी 

 

 

 

 

 

 

 


तारीख: 12.09.2020                                                        मिर्ज़ा ग़ालिब






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