बेटों की 'अपेक्षा' और बेटियों की 'उपेक्षा' करना बंद करो

बेटों की 'अपेक्षा' और बेटियों की 'उपेक्षा' करना बंद करो...

"मीना बहु; कल सुबह तैयार रहना. याद है न अस्पताल जाना है जाँच के लिए..." - सासु माँ ने फ़रमान सुनाया तो मीना ने डरते-डरते सिर हिला दिया.

"रोहन; मम्मी जी जाँच के लिए बार-बार ज़ोर दे रही हैं. तुम ही समझाओ न माँ को..." - मीना ने रोहन को समझाया तो रोहन तिलमिलाते हुए बोला - "ठीक ही तो कह रही है माँ; एक बार जाँच कराने में क्या हर्ज़ है?"

"हर्ज़ क्यों नहीं है रोहन. पहले भी तो..." कहते-कहते मीरा रोने लगी. मीना के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

"कब तक शोक मनाती रहोगी?" रोहन ने झुंझलाहते हुए कहा.

"रोहन! तुम्हारे लिए वो सिर्फ हाड़-मांस का टुकड़ा था., पर वो मेरे जिस्म का ही नहीं., मेरे दिल का भी टुकड़ा था. जिसे तुमने अपनी ओछी मानसिकता के कारण, उसे बोझ समझ; गर्भ में उसके टुकड़े-टुकड़े करा कर मार डाला. तुम हत्यारे हो रोहन!! तुमने मेरी बेटी को मार डाला... तुम हत्यारे हो..." बदहवास-सी चीखती मीना; बेहोश हो गई और जब आँखों खुली तो खुद को अस्पताल के कमरे में पाया.

"मेरा बच्चा... मेरा बच्चा... ठीक है न डॉक्टर!" - मीना का स्वर कम्पित हो उठा.

"हाँ... हाँ... आपका बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है" - डॉक्टर की बात सुन मीना की जान में जान आई. लेकिन अगले ही पल उसका दिल धड़कने लगा.

"कल की सुबह न जाने उसके बच्चे के लिए कैसी सुबह होगी? क्या एक औरत को इतना भी अधिकार नहीं की वो बच्चे को अपनी इच्छा से जन्म दे सके? अरे! आज भी लोगों की कैसी मानसिकता है जो बेटा-बेटी में फर्क करती है...??" सोचते-सोचते मीना की आँख लग गई.

सुबह आँख खुलते ही रोहन समेत; सास-ससुर उसके  इर्द-गिर्द खड़े थे.

"रोहन; मैंने फैसला ले लिया है., मैं इस बच्चे को जन्म नहीं दूंगी." मीना की बात सुनकर सभी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई.

"तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है..." - ससुर ने तिलमिलाते हुए कहा.

"दिमाग़ नहीं; ये तो पूरी तरह से पागल हो गई है. भला कभी सुना है की गर्भ में बेटा हो और कोई माँ अपने बेटे का ही गर्भपात कराना चाहती हो., ये पाप है... " - सास ने ताना देते हुए अपना सिर पकड़ लिया.

"लेकिन गर्भ में बेटियों की तो हत्या करना जैसे पुण्य का काम है. आपने भी तो मेरी बेटी को गर्भ मरवा डाला."

"तो क्या; अब इसका बदला तू हमारे पोते को मारकर लेगी." सासु माँ ने तिलमिलाते हुए मीना को बीच में टोका.

"बेटा हो या बेटी; गर्भ ने समान रूप-से सींचा;
माँ की ममता ने प्यार-से भींचा..."

"जब कोख ही शिशु में भेदभाव नहीं करती तो आप और हम कौन होते हैं??" सासु माँ! हमेशा बेटा होने की ही अपेक्षा क्यों की जाती है? क्या बेटी का कोई अस्तित्व नहीं? इस तरह से तो आपको और मुझे भी इस समय यहाँ नहीं होना चाहिए. "हर समय बेटे की अपेक्षा और बेटी की उपेक्षा क्यों होती है??" मीना ने अनगिनत प्रश्नों की लाइन लगा दी.

"देखना तेरा बेटा ही होगा... अरे! तेरा तो भाई आने वाला है... भगवान बस एक बेटा दे दे., हमारा वंश आने वाला है. बेटा... बेटा... बेटा... "बेटों की 'अपेक्षा' और बेटियों की 'उपेक्षा' करना बंद करो..." भगवान से शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बच्चे के लिए प्रार्थना करो., न की सिर्फ बेटे के लिए..." मीना सजल आँखों से हाथ जोड़ने लगी.

"आपको और आपके समाज को बेटियों की भूर्ण हत्या करने का अधिकार किसने दिया? ये अधिकार तो ईश्वर को भी नहीं... और यदि आपको बेटी को मारने का हक है., तो मुझ जैसी माओं को भी बेटी के प्यार और मोह में बेटे की हत्या करने का भी हक है..., और मैं उसी हक का इस्तेमाल कर रही हूँ." मीना का स्वर गुस्से में ऊँचा हो गया.

"मीना बिलकुल ठीक कह रही है माँ..." रोहन ने अपनी चुप्पी तोड़ी.

"मीना के साथ तेरा दिमाग़ भी ख़राब हो गया है?" माँ ने ताना मारा.

"हाँ माँ!! दिमाग़ तो ख़राब हो गया था., जो एक पाप कर डाला. लेकिन अब दूसरा पाप नहीं... मीना! कल रात; तुम्हारे आरोप से, मेरी रूह कांप गई. तुमने सच कहा मैं हत्यारा हूँ., कातिल हूँ... मैंने अपनी नन्ही सी अजन्मी बेटी को मार डाला. मुझसे बड़ा राक्षस कौन होगा. जब डॉक्टर तुम्हारा अल्ट्रासाउंड कर रही थी तो उसने मुझे गर्भ में हमारे बच्चे को दिखाया. उस बच्चे में मुझे हमारी अजन्मी बच्ची की चीख सुनाई दी., जैसे गिड़गिड़ाकर कह रही हो - "बाबा!! मैं आपकी बेटी हूँ; बोझ नहीं..."

और मुझे मीना के हाथ में एक कागज़ मिला जिस पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थी."

"बाबा!! मैं आपकी बेटी हूँ; बोझ नहीं...
बहादुर हूँ; बेबस नहीं...
बेहतर हूँ; बेकार नहीं...
बाप के कंधे का सहारा हूँ; बेसहारा न मुझको करना...
बिना बात के यूँ; बर्बाद न करना...
बेटी है देवी-का रूप; बन जाती, माँ-का स्वरूप...
बेइंतहा करती है प्यार; बेटियों-से ही तो है संसार...
बेइज़्ज़ती के डर-से कुछ न कहती;


बिन-बोले हर बात समझती...
बेड़ियाँ न डालो पैरों में; बंदिशे न लगाओ...
बंधन में न बांधों; बेकार के संस्कारों-से न आंकों...
बेपर्दा क्यों करते हो उसका चरित्र;
बून्द-सी कोमल और है पवित्र...
बिखरने मत दो उसका व्यक्तित्व;
बोध करो,बेटी का अस्तित्व...
बेटी का करो सम्मान; बिन इनके न जीवन आधार..."

"मीना मैं जानता हूँ., मेरा गुनाह माफ़ी के लायक नहीं पर मैं अपने गुनाह का पश्चाताप करना चाहता हूँ. मुझे सिर्फ एक मौका दे दो..." रोहन रोते रोते मीना के आगे हाथ जोड़ने लगा.

"रोहन! ये सिर्फ कविता ही नहीं; एक माँ के अल्फाज़ और ज़ज़्बात हैं; जिसे मीना ने बहुत ही खूबसूरती से शब्दों और भावों के माध्यम से व्यक्त किया है और मीना इतनी कमज़ोर या बुदज़िल नहीं की अपने ही गर्भ में पल रहे बच्चे को मार डाले. वो तो सिर्फ माँ है., माँ ..." डॉक्टर ने मुस्कुराती आँखों-से मीना को देखा.

"तो इसका मतलब..."

"जी हाँ!! इसका मतलब., हमने मीना का अल्ट्रासाउंड ज़रूर किया., सिर्फ ये देखने के लिए की बच्चा स्वस्थ है न की ये जाँचने के लिए गर्भ में लड़का है या लड़की... और मीना भी ये बात जानती है. गर्भ में बेटा या बेटी की जाँच कराना कानूनी अपराध ही नहीं; ईश्वर की नज़रों में गुनाह है... मेरा कर्म और धर्म., ईश्वर की बनाई कृति को जन्म देने में मदद करना है न की हत्या करना... हम  डॉक्टर हैं; कसाई नहीं..." डॉक्टर ने सजल आँखों से कहा.

"मीना!! ये पोस्टर देखो. इसमें तुम्हारी कविता रचित है., अस्पताल ने इसे यहाँ लगाने की मंज़ूरी दे दी है. शायद इसे पढ़कर किसी और बाप का दिल पिघल जाये और एक न एक दिन इस समाज की भी मानसिकता बदल जाये और बेटों की 'अपेक्षा' और बेटियों की 'उपेक्षा' करना बंद कर दे." डॉक्टर ने मीना के परिवार वालों को देखा तो सभी हाथ जोड़े., शर्मिंदा खड़े थे और मीना की मुस्कुराती आँखें डॉक्टर का शुक्रिया और गर्भ में पल रहा बच्चा भी; पैर मारकर अपनी ख़ुशी व्यक्त कर रहा था. अब मीना को सिर्फ और सिर्फ अपने आने वाले बच्चे का इंतज़ार था.


तारीख: 11.10.2021                                                        मंजरी शर्मा






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