भांडे मे ही भेद है,पानी सबमे एक

बस आकर रुकती तो जितने उसके अंदर चढ़ते उससे कई ज्यादा लड़के लपक के बस की छत पर चढ़ जाया करते थे | शॉपिंग सेंटर बस का एक स्टोपेज था | यहाँ बस के इंतज़ार मे खड़े अधिकतर , अभियांत्रिकी महाविद्यालय के विद्यार्थी हुआ करते थे जो वहाँ से लगभग 3-4 किलोमीटर पर था |

बस की छत पर बैठना आनंद था या अपने कूल होने का प्रतीक पर जो भी हो , जिसने चार साल की इंजीनियरींग मे उस बकैती के मजे नहीं लिए जो बस की छत के ऊपर हुआ करती थी तो उसने बहुत कुछ अधुरा ही छोड़ दिया |

महाविद्यालय शहर की भीड़ – भाड़ से दुर होते है इस छोटे से सफर मे दोनों तरह पहाड़ ही पहाड़ और ज़्यादातर गोदाम ही गोदाम ही थे जिसमे लोहा भरा होता था |

अनगिनत बाते और किस्से है इस छोटे से रास्ते के , चाहे वह दो पहिये की गाड़ी पर चार जनो का बैठ कर आना हो या गाड़ी से गिरने की दुर्घटना हो | देर रात्रि मे इसी रास्ते से चाय पीने जाना हो या फिर रात मे कॉलेज के वार्षिक कार्यक्रम से बस की छत पर चढ़कर सैंकड़ों का एक साथ धमाचौकड़ी मचाते हुए आना और जाना हो | परीक्षा के समय  हाथ मे किताब लिए इसी रास्ते से जाना हो | ये ऐसी यादें है जो मस्तिष्क के किसी कोने मे सदा के लिए स्थित रहेंगी |

हाँ इसी रास्ते मे एक छोटा सा खेत पड़ता था जिसके पास से एक गली जाती थी वहाँ  एक भगवा ध्वज लहराता दिखता था | अवश्य ही कोई मंदिर होगा , बस की छत से दिखता तो नहीं था पर क्योंकि मंदिर है तो दुर से सर झुका दिया करते थे और  इस चार वर्ष की यात्रा मे कितनी ही मन्नते की होंगी |

अलबत्ता परीक्षा देने जाते वक्त जैसे कि भगवान बस ये वाला पेपर निकलवा देना इसमे कुछ नहीं आता | बस इस बार शॉर्ट अटेंडेंस से बचा लेना | इसमे सिलेक्शन  हो जाये , ऐसा हो जाये वैसा हो जाये और न जाने क्या क्या |

जो कभी कुछ मन का हो जाता तो लौटते वक्त वंही बस के ऊपर से ही सर झुका कर असीम कृपा के लिए धन्यवाद कर दिया करते थे |

बस अब चार सालों का सफर अंतिम पड़ाव पर ही था , अंतिम वर्ष की परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थी बस कुछ प्रायोगिक परीक्षाएँ होना बाकी था | आज कॉलेज जल्दी भी जाना था |

इतने मे सहपाठी जलज अपनी स्कूटी लेकर आ गया | जाते जाते रास्ते मे न जाने क्या सुझी कि अब कुछ ही दिन बचे है फिर न जाने इन रास्तो पर कब आना होगा | अरे जलज गाड़ी इस खेत के पास वाली गली मे लेना जरा |

मन मे था कि एक बार इस मंदिर मे हो ही आते है वरन चार सालो मे एक बार भी नहीं गये | हमेशा दुर से ही राम – राम की हैं , कंही प्रभु रुष्ट न हो जायें |

हमेशा से जहां वह भगवा पताका लहराती थी , वंही स्कूटी रोकी तो सामने एक बड़ा सा लोहे का गेट था , बाहर तीन चार टायर और खुले इंजन पड़े थे | जब गेट से भीतर झाँक के देखा तो पुरानी लेथ मशीन , रेल की पटरियां , टूटे फुटे ट्रको के कलपुर्ज़े पड़े थे | मंदिर नहीं वह लोहा संग्रहण के लिए बड़ा सा गोदाम था |

क्या हुआ अगर ये मंदिर नहीं है तो , हमारी श्रद्धा तो पूर्णत: शुद्ध थी और वैसे भी भगवान तो कण-कण मे मौजूद है |

इससे एक बात और सिद्ध हो गयी कि अगर निष्ठा से सर कंही भी झुका लिया जाये तो संतुष्टि एक सी ही प्राप्त होती है फिर चाहे वो मंदिर हो या गोदाम महत्व केवल झुकने का है , कहाँ झुक रहे है उसका नहीं |

गेट के सामने नमस्कार किया , धरती को छुआ और चलते बने | जलज यह सब स्कूटी पे बैठा ये सब देख रहा था | ये क्या कर रहा था तू , दिमाग सही है , हैरानी के साथ जलज ने कहा |

अरे यार कुछ नहीं एक लंबी कहानी है बाद मे सुनाऊँगा कभी , अभी जल्दी चल वरना लेट हो जाएँगे पर जलज की उत्सुकता बरकरार थी , फिर भी बता तो ऐसा क्यों किया ? मैंने वहां ऐसा इसलिए किया क्योंकि कबीर दास जी ने कहा है :-

कबीरा कुआं एक है , पानी भरे अनेक

भांडे मे ही भेद है , पानी सबमे एक |

ये कहते हुए मै हंस दिया हालाकि जलज अभी भी कन्फ्युज था |


तारीख: 21.07.2021                                                        कल्पित हरित






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