ब्लॉक प्रमुख चुनाव की तैयारी 

 

चाय का प्याला नीचे रखते हुए घसीटेलाल ने अपने दोनों हाथों से आँखे मलते हुए कहा, "लगता है आज इंद्रदेव दिनभर अपना प्रकोप दिखाएंगे"।

 

कुछ दिन पहले ही भरूआ ब्लॉक प्रमुख के चुनाव की घोषणा हो चुकी थी और इसी वजह से कई दिनों से घसीटेलाल अखबार के पन्ने पलटते हुए सुबह की चाय पीते थे। लेकिन आज का अखबार देर रात से हो रही भारी बारिश के कारण बाहर पड़ा गीला हो चुका था। 

 

थोड़ी देर बाद ही घसीटेलाल तैयार होकर मोटर साइकिल लेकर निकले पड़े। पूनिया और राजकुमार, पंचायत समिति के सदस्य व घसीटेलाल के मित्र, उनकी राह देख रहे थे। तीनों लोगों की बातचीत चल ही रही थी तभी वहां एक वार्ड मेम्बर कल्लू आ गया। कल्लू ने ब्लॉक से जुड़े 'पुरवा' गांव में चल रहे ज़मीनी विवाद की ख़बर सुनाई। 

 

मसला यह था कि दो पड़ोसियो के बीच ज़मीन को लेकर सालों से विवाद था। लेकिन अब विवाद ज्यादा बढ़ रहा था। घनश्याम दास का बड़ा बेटा मुख्खी अगले प्रधान के चुनाव के लिए धौंस ज़माने की फिराक में था। इसीलिए उसने ज़मीन के विवाद को लेकर अपने पड़ोसी रामअवतार, जो पेशे से स्कूल मास्टर थे, उनको वापस तंग करना शुरू कर दिया। पिछले दिन ही मुख्खी ने अपने टूटपूंजीये गुंडों से मास्टर जी के स्कूल में तोड़ फोड़ करवा दी थी। और यह ख़बर आज के अखबार के आठवें पन्ने पर छपी थी। 

 

वैसे तो गांव नगरों में ख़बरें तुरंत फ़ैल जाती है किन्तु घसीटेलाल कल ही राजस्थान से एक रिश्तेदार के घर की शादी से लौटे कर आए थे, और ख़बर उन तक नहीं पहुँच पायी थी । घसीटे ने राजकुमार और पूनिया की तरफ देखा और सोचते हुए बोला, "अब ये गुंडागर्दी पे उतर आए है तो निपटारा करा ही देते है फ़िर।" 

       

घसीटेलाल के लिए ब्लॉक प्रमुख की गद्दी उतनी ही महत्वपूर्ण थी जितनी व्हाइट हॉउस या 10 डाउनिंग स्ट्रीट की गद्दी उसके उम्मीदवारो के लिए। पुरवा गांव के दो परिवार की लड़ाई में घुसने की उसको कोई चाह नहीं थी पर बात प्रमुखी के चुनाव की थी तो सुलह करवाना उसे सही लगा। ठीक उसी तरह, जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति भारत और उसके पड़ोसी देश के विवाद में बार बार कूदते सुनाई देते है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और चीन के बीच वर्तमान सीमा पर जारी गतिरोध के लिए मध्यस्थता करने का प्रस्ताव भी दिया था। इस वर्ष अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव है और अपनी कूटनीति की कला दिखा कर प्रशंसा बटोरने का सही समय भी । 

 

अगली दिन ही घसीटेलाल विवाद का समाधान कराने गांव पहुंचा। प्रधान को बुलाया और बात करी। प्रधान उम्र में बड़े थे और गरम मिजाज़ के भी। उन्होंने गर्मी दिखाते हुए उल्टे मुँह घसीटे को जवाब दे दिया, "ज्यादा पालिटिक्सगिरी ना दिखाओ हमाई देहरी पर, प्रमुखी के चुनाव है तो समझौता करावें आ धरे फड़फड़ाते हुए।" 

 

घसीटेलाल अपना गुस्सा पीकर और समझदारी दिखा कर बोला, "विवाद दो घरों में हुआ है और गुंडागर्दी स्कूल में चल रहीं है। आपको अंदाजा है अगर कलेक्टर साहब दौरे पर स्कूल आ गए तो क्या हाल करेंगे? ताव दिखाना फिर उनके सामने ही! "

 

घसीटे ने दोनों पक्ष पर सुलह कराने की रणनीति बनाई। उसे पता था मुख्खी की गुंडागर्दी से गुस्साए लोग उसे प्रधान बनते हुए देखना पसंद नहीं करेंगे । उसने मास्टरजी को विवादित जमीन का हिस्सा मुख्खी को देने की सलाह दी। जैसे ही मख्खी को यह खबर लगी, उसने घसीटे को विवाद के बीच में न घुसने को बोला। उसे लग रहा था अगर यह विवाद जल्दी खत्म हुआ तो अपनी धौंस जमाए रखने के लिए फिर से कोई नया बखेड़ा शुरु करना होगा। 

 

घसीटे ने मास्टरजी को अगले प्रधान बनने और ऊपरी जमीन के बदले कुछ रकम देने की लालसा दी और कहा, "देखो मामला को रफा-दफा करो। वरना आए दिन मुख्खी के संगी साथी तुम्हें परेशान करते रहेंगे। एक बार प्रधान बन जाओगे तो उसकी सारी हेकड़ी निकल जाएगी। तुमसे लोग प्रभावित है गांव में। अपनी यही छवि बनाये रखो। " 

 

घसीटे का मास्टरप्लान था कि मास्टर जी को हाथ में लेकर मामला शांति से सुलझा दे। इससे सबसे बड़ी फायदे की बात यह थी कि मास्टर जी की मदद करके लोग उससे खुश होंगे और पंचायत समिति में उसका बोलबाला भी बढ़ेगा। 

 

अगर मामला ब्लॉक प्रमुख के चुनाव का ना होता, तो घसीटेलाल को भी सुलह कराने की खुजली ना होती। बात चाहें अंतरराष्ट्रीय स्तर चुनाव की हो या ग्राम स्तर की, डिप्लोमैसी अर्थात कूटनीति की झलक तो हर स्तर में दिखती हैं।


तारीख: 06.06.2020                                                        अंकिता सेंगर






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