चोरी के लम्हे

 

सुनो ... लगता है दीदी की तबियत ज़्यादा खराब है, तुम कहो तो कल मैं उन्हें देख आऊँ? सरला ने दुखी होते हुए अपने पति से कहा.

सरला जी व्यवहार से सरल और नम्र स्वभाव की, पिछले चालीस वर्षों से अपने पति के साथ रह रही थी. लेकिन इन वर्षों में अपने पति की इजाज़त के बिना एक कदम भी अपनी मर्ज़ी का ना उठाया. इसलिए आज भी अपने पति से पूछ रही है. सरला जी के दो बच्चे, बेटाबेटी है. बेटा विदेश में अपने परिवार के साथ तो बेटी भी अपने छोटे से परिवार के साथ खुश थी और सरला जी के पति भी सरकारी रिटायर हो चुके थे. घर में पैसे की कमी ना थी, लेकिन फिर भी कभी एक रुपया भी उन्होंने बिना पूछे खर्च नहीं किया.

खैर, सरला जी सुबह पूरी तैयारी करके 11 बजे अपनी दीदी से मिलने निकल जाती है, जो उनके घर से लगभग आधे घंटे का है. नमस्ते जीजाजी... दीदी कैसी है? डॉक्टर को दिखाया? क्या कहा उन्होंने? ट्रैन की रफ़्तार से बोलते हुए दीदी के कमरे में चली जाती है.

अरे, दीदी; आप तो बिलकुल ठीक हो, फिर जीजाजी ने मुझे फोन क्यों किया और आप दोनों मुस्कुरा क्यों रहे हो? ये ले ठंडा पानी पी और ज़रा प्रश्नो की झड़ी को बंद कर.दीदी ने कहा.

अब सुन, ये तेरे जीजाजी का प्लान था. पिछले सन्डे तेरा जन्मदिन था, तब तेरे जीजाजी और मेने तुझे विश करने के लिए फोन किया, लेकिन हमेशा की तरह तेरी बातों में उदासी थी, हम जानते थे हमेशा की तरह तेरे पति को ना तो जन्मदिन याद होगा और ना ही उसे मनाने का कोई उत्साह. इसलिए तेरे जीजाजी ने ये प्लान बनाया.

तू तो जानती है अपने जीजाजी को, वो तुझे अपनी बहन मानते हैं और उमेश, तेरे पति की तेरे प्रति उदासीनता उनसे देखि नहीं जाती. शुरू से ही  उमेश अपने ऊपर खुला खर्चा किया. अपनी हर ख़ुशी हर त्यौहार को अपनी मर्ज़ी से मनाया. लेकिन तेरे लिया क्या??? कभी तेरी ख़ुशी देखी?  कभी तेरे बारे में सोचा? या तेरी इच्छा पूछी? नहीं ना ... अब तो बच्चे भी अपनी दुनिया में मस्त है, लेकिन तू??  तू तो वही की वही है.

तुझे मेला बहुत पसंद है... यहीं पास में तीज का मेला लगा है इसलिए तेरे जीजाजी जी की तरफ से राखी का सरप्राइज़ गिफ्ट. चल, तू और मैं मेला घूमने चलते हैं खूब मस्ती करेंगे.

नहीं दीदी.. अगर उन्हें पता चल गया तो बहुत बुरा होगा और अब कोई उम्र है मेला घूमने की?

उम्र तो तेरी हो गई है, मैं तो अभी भी स्वीट सिक्सटीन हूँ और दीदी खिलखिला उठी. चल ना... चोरी के ही सही, ये पल जी ले.

सरला, ये लो भाई की तरफ से बहन को शगुन. प्लीज़ ना मत करना ख़ुशी ख़ुशी मेले में जाओ और खूब एन्जॉय करो. मैं भी कुछ टाइम ज़रा जी लूँ , तुम्हारी दीदी से कुछ समय पीछा तो छूटेगा. दीदी ने घूर कर जीजाजी को देखा तो वो मुस्कुराते हुए अपने कान पकड़ने लगे.

दीदी और जीजाजी की नौक- झोंक कितनी प्यारी लगती है. कहीं कोई ईगो नहीं, कोई कमेंट नहीं, बस एक दूसरे के प्रति प्रेम और सबसे बड़ा सम्मान है, जो मेरे और उमेश के बीच कभी नहीं था.

ड्राइवर जरा गाड़ी साइड पर लगाओ मैं अपनी सोच से वर्तमान में आ गई. अरे, वो देख भुट्टा ... तुझे कितना पसंद है ना. चल, भुट्टा खाते हैं. सच में रिमझिम बारिश की बूंदे और गरमा गर्म भुट्टा का आनंद उसे बहुत भाता था लेकिन आखिर में कब उसने भुट्टा खाया उसे भी याद न था.

मिटटी की सोंधी खुश्बू ने सरला को तरोताज़ा कर दिया. मेले में जाकर दोनों बहने बच्चों की तरह तालियां बजाने लगी. मेले में अच्छी खासी भीड़ और शोर शराबा था, लेकिन सरला को ये शोर किसी गाने की धुन से कम नहीं लग रहे थे. धक्का मुक्की भी उसे अपनेपन का एहसास दे रही थी.

दीदी... चलो झूला झूलते है. सरला, बच्चे की तरह जिद करने लगी. हाँ.. हाँ.. चल. कभी ऊपर से नीचे चलता झूला तो कभी गोल गोल घूमता झूला, सरला खूब हंसती खूब शोर करती. आज भी सरला ने दीदी का हाथ कस कर पकड़ा था, जैसे बचपन में खो जाने के डर से पकड़ती थी. हाथ पकड़े कभी एक स्टाल पर जाती तो कभी दूसरे स्टाल पर हर सामान को छू कर देखती जैसे उसके एहसास को अपने अंदर समा लेना चाहती है.

मेले में जगह जगह कहीं ढोल बज रहे थे तो कहीं बाजे.. सरला का मन तो नाच और झूम रहा था लेकिन पैर अभी भी लोक लज्जा की वजह से बंधे हुए थे.

सरला को चूड़ियां बहुत पसंद थी उसने ढेर सारी रंगबिरंगी चूड़ियां खरीदी और उन्हें पहन लिया. थोड़ी थोड़ी देर में अपनी चूड़ियों को खनखनाती, तो उसकी हंसी भी खनकने लगती.

मेले में कई सारे खेल तमाशे थे, तो जादूगर की जादूगरी भी. सरला हर खेल को हैरत भरी आँखों से देखती फिर खेल पूरा होने पर खूब तालियां बजाती.

सरला ने गुब्बारों पर खूब गोलियां बरसाई जैसे सामने गुब्बारा नहीं उसका दुश्मन हो, गुब्बारे वाला भी हैरानी से सरला को देख रहा था. शायद इससे पहले कभी किसी ने इतने गुब्बारों पर निशाना नहीं लगाया और वो भी एक महिला. पर ये निशाना किस पर था, दीदी भलीभाँती जानती थी.

बचपन से ही सरला को कठपुतली का नाच बहुत अच्छा लगता. धागों का ताना-बाना और उँगलियों पर नाचती कठपुतली देखकर वो खुश हो जाती थी. लेकिन आज कठपुतली का नाच उसे बिलकुल भी भा नहीं रहा था. शायद उस कठपुतली में उसे अपना ही अक्स नज़र आ रहा था. दीदी बहुत भूख लगी है चलो ना पहले कुछ खाते है. दीदी उसके मन की बात नहीं जानेगी तो कौन जानेगा. दोनों खाने के स्टाल पर जाती है.

सरला के लिए आज ना तो उम्र की सीमा थी और ना ही पेट का बंधन.चाट पकोड़ी देखकर उसके मुंह में पानी आ जाता है. कभी बड़ा सा मुंह खोलकर गोलगपा खाती है, तो कभी उँगलियाँ चाट कर आलू टिक्की, पकोड़े और ना जाने किस किस की खुश्बू लेती और चटरपटर खाती. रंगबिरंगे गोले की चुस्की उसे मदहोश कर रही थी.

तीज का त्यौहार हो और मेहँदी न हो... कुछ कुछ दूरी पर मेहंदी के स्टाल थे, सरला मेहँदी के डिज़ाइन देखती और अपनी नज़र फेर लेती क्योंकि हाथों पर मेहँदी का रंग उसकी ख़ुशी में भंग ला सकता था. खैर मेले के आनंद ने उसके मन को मेहँदी के रंग से भी ज़्यादा गहरा कर दिया था. घर जाने का समय हो रहा था, उसने अपनी सारी चूड़ियां उतार कर मेहंदी लगाने वाली लड़की को पहना दी. चूड़ियों की खनक को वो अभी भी महसूस कर रही थी.

सरला बहुत खुश थी, एक एक पल को उसने बहुत उमंग और आनंद से जिया. कुछ समय के लिए ही सही इन चोरी के लम्हों ने उसके दिल को अनमोल ख़ज़ाने से जो भर दिया.


तारीख: 15.07.2020                                                        मंजरी शर्मा






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