दो रुपये का भार

 

उस  दिन मैं रोज सुबह की तरह मम्मी से चार पराठो की जगह तीन पराठों पर बहस करते हुए अपनी लोकल छूटने की दुहाई दे रहा था, और मम्मी ने रोज की तरह मुझे तीन पराठे दिखा कर टिफिन में चार पराठे डाल दिए। मैं घर से निकला और तेज़ी से चलते हुए बैग के वजन से पराठों की गिनती का अंदाजा लगा रहा था की इतने में मुझे उस डीज़ल इंजन वाले लोकल की आवाज़ सुनाई दी। हालाँकि लोकल रोज सुबह ७ बजे यानि की एक घंटे लेट आती थी लेकिन आज पता नहीं कैसे ६ बजे ही आ गयी , खैर मैंने दौड़ लगा दी और सबसे पहले तीन रूपये की टिकट ली और लोकल में चढ़ा। चढ़ने के बाद सबसे पहला काम कोई ऐसी जगह ढूँढना जहाँ खिड़कियों से थोड़ी सी भी हवा न आये, क्यूंकि जनवरी का महीना और ठंढ ऐसी की ट्रेन किसी स्टेशन पर रुके तो बोगी के अंदर तक कोहरा भर जाता था। 

तो भाई साब ट्रेन तो आज पहले आ गयी थी, टाइम से आने का मतलब ये नहीं की आप टाइम से पहुँच भी जाए, भारतीय रेल है सर इनके अपने कुछ स्टैंडर्ड्स हैं। अपनी इसी बनायीं हुई इज़्ज़त का ख्याल रखते हुए ट्रेन एक स्टेशन पर रुक गयी। 
उस वक़्त लोकल की बोगियां एक दूसरे से जुड़ीं हुई नहीं होती थीं, तो ट्रेन रुकने से वेंडरों को काफी फायदा होता था क्यूंकि वो आसानी से नीचे उतर एक बोगी से दूसरी बोगियों में जा-जा कर समान बेच सकते थे और ऐसे में पूरी बोगी चाय और चने बेचने वालों के आवाज़ों से भर जाती थी। उस दिन उन चाय और चने के अलावा मुझे एक और आवाज़ सुनाई दी जो की किसी मूंगफली बेचने वाले की थी, ये आवाज़ अलग इसलिए थी क्यूंकि सुबह के साढ़े छे बजे कोई चाय और चने छोड़ कर भूनी हुई मूंगफलियां नहीं खरीदता था। आवाज़ सुन कर मैंने गर्दन ऊपर उठाया तो देखा एक बूढ़ा आदमी जिसकी उम्र करीब ६० के आस-पास होगी जो हाथ की बनी हुई मोटे ऊन की स्वेटर और सर पर मंकी टोपी पहने अपने बाएँ हाथ की उंगलियों और हथेलियों में मूंगफली के छोटे-छोटे पैकेट और दाहिने हाथ में एक झोला लिए हुए खड़ा है।

मुझे उस वक़्त रोज घर से १० रूपये मिलते थे कोचिंग जाने के लिए, जिसमे से मैं ३ रूपये जाने और ५ रुपयों के वापस आने की टिकट लेता था और बचे हुए २ रूपये मेरे होते थे जिन्हे मैं या तो बचा कर अपनी जीन्स के छोटे पैकेट में रख लेता था या फिर खर्च कर देता था। मैंने अपने उस दो रूपये का हिसाब लगाया और उस मूंगफली वाले से एक पैकेट का दाम पूछा जिसके जवाब में उसने कहा ५ के तीन और २ का एक। मैंने उसे ५ का सिक्का दिया और और उसका चेहरा देखते हुए ये सोचने लगा की ऐसी क्या वजह होगी जिसकी वजह से यह इंसान इस उम्र और ठंढ में इतनी सुबह मूंगफलिया बेंच रहा है। मेरे दिमाग में बस दो चीज़े आयी, पहली- इसके बच्चे नहीं हैं और दूसरी ये की इसे इसके बच्चों ने घर से निकाल दिया है। मुझे दूसरा वाला पॉइंट ज्यादा सही लगा तो मैंने वही मान लिया। 

do rupaiye ka bhaar

मैं अपने आप में खोया हुआ था की उसने मुझे तीन मूंगफलियों के पैकेट पकड़ा दिए, जिसपर पलट कर मैंने उसे दो पैकेट वापस देते हुए कहा की मुझे सिर्फ एक ही चाहिए। इस बात पर उसने मेरे हाथ से तीनों मूंगफलियों की पैकेट उठाया और मेरे हाथ में वापस मेरा ५ का सिक्का रख कर कहा की जब एक चाहिए तो सिर्फ २ रूपये दो मैं ३ रूपये वापस नहीं दूँगा। फिर मैंने अपने जीन्स के छोटे पैकेट निकाल कर उसे २ का सिक्का दिया तो वो मुझे मूंगफली का एक पैकेट पकड़ा कर जाने लगा, जब वो जा रहा था तो मैंने देख की उसे चलने में थोड़ी तकलीफ़ है, उसको चलने के लिए किसी सहारे की जरूरत तो नहीं लेकिन वो लंगड़ कर चलता था।
फिर न जाने कैसे वो मुझे हर रोज मिलता और मैं हर दिन उससे दो रूपये की मूंगफली लेता, जिसे देते वक़्त वो रोज मुझे ५ रूपये के तीन पैकेट का ऑफर देता। न कभी मैं उससे दो रूपये से ज्यादा की मूंगफलिया ले पाया और न वो कभी मुझे अपना ५ का तीन ऑफर बेंच पाया, मेरा और उसका बस इतना ही रिश्ता था।

कुछ एक या डेढ़-दो महीने बाद, एक दिन मैं कोचिंग जाते वक़्त ट्रेन की गेट पर खड़ा सुबह की गुनगुनी धूप ले रहा था और ट्रेन हमेशा की तरह रुकी हुई थी। इस बीच कई चाय बेचने वालों ने मुझे धक्का देकर गेट से आगे-पीछे किया लेकिन मैं बिलकुल अपनी जगह पर खड़ा रहा। फिर अचानक मेरे कानों में मूंगफली बेचने वाले की आवाज़ पड़ी, जिसे सुनते ही मैंने अपनी पैकेट से दो का सिक्का निकाल कर हाथ में रख लिया, इतने में मुझे एक और आवाज़ सुनाई दी जो ट्रेन के खुलने की थी। मैंने उचक कर बाहर देखा तो पाया की मूंगफली वाला तेज़ कदमों से लंगडते हुए मेरे गेट तक पोहचने की कोशिश कर रहा है और इधर ट्रेन खुल चुकी थी। मूंगफली वाला हल्का दौड़ता हुआ मेरे गेट के पास तो पोहच गया लेकिन हाथ में झोला होने के कारण ट्रेन की गेट नहीं पकड़ पा रहा था, फिर मैंने उसका झोला पकड़ कर अंदर रखा और उसे हाथ दिया, प्लेटफॉर्म ख़त्म हो चुका था और मूंगफली वाले ने बोगी की निचली सीढ़ी पर अपना दाहिना पैर तो रख लिया मगर बांया पैर अभी भी निचे ही था। मैंने पूरी कोशिश की उसे जितनी जल्दी हो सके ऊपर खींच लूँ लेकिन मेरे अकेले के बल लगाने से क्या ही होता, उस दौड़ के बाद मूंगफली वाले के क़दमों में इतनी शक्ति नहीं बची थी की वो अपने घुटने मोड़ बोगी की अगली सीढ़ियों पर आ सके। 
अचानक ही वह चीखा- "बबुआ ! झोरा बिग द।"( बेटा झोला फेंक दो )
मुझे कुछ समझ नहीं आया, मैंने उसका झोला उठाया और गेट से बाहर फेंक दिया जिसमे से मूंगफलियों के पैकेट पटरी के किनारे बिछी गिट्टियों पर गिरे और बिखर गए।  इसके बाद उसने मेरे हाथों से अपनी पकड़ ढीली कर दी और दाहिने हाथ से पकड़ा हुआ बोगी का गेट छोड़ दिया और कहा- "हम न सकब बबुआ छोड़ द, हम उतर जाइम।" ( मैं नहीं चढ़ पाउँगा बेटा छोड़ दो मैं उतर जाऊँगा। )
मेरे लिए यह सोचना भी भयानक था की इस रफ़्तार पकड़ चुकी ट्रेन से किसी लटके हुए इंसान का हाथ छोडूंगा तो क्या होगा, मगर फिर भी उसने वही बात कही और मुझे साफ़-साफ़ याद है इसबार जाने क्यों वो मुस्कुरा रहा था। मेरे अंदर की आत्मा कांप रही थी और अब शरीर भी, मेरे न चाहते हुए भी उसका हाथ मेरे हाथों से छूट गया और वो किसी गेहूं की बोरी की तरह गिट्टियों पर गिरा। गिरते ही उसके मटमैले ऊनि स्वेटर का अगला हिस्सा फटा और अंदर के शर्ट की जेब में रखे सिक्के पटरियों पर छन्न की आवाज़ के साथ बिखर गए। मैंने बहार झाँका और आगे बढ़ती ट्रेन से बस इतना ही देख पाया वो अपने दोनों घुटने पकड़ कर बैठा है।

मैं कोचिंग में था लेकिन मेरा मन अभी भी उसी स्टेशन पर था, मैं भारी था, मेरा मन भारी था जैसे मेरे हाथों से किसीका हाथ नहीं आत्मा छूटी हो। मैं बीच क्लास से उठा और बाहर चला आया और सीधे स्टेशन के तरफ चल पड़ा। एक लोकल मिली और मैं वापस उसी स्टेशन पर पोहचा और उतर कर सामने वाली प्लेटफॉर्म के आगे तरफ पटरियों पर भागा। लेकिन अब लगभग दो घंटे से ज्यादा बीत चुके थे और उन पटरियों पर मुझे कोई न मिला सिवाए एक मूंगफली की फटी हुई पैकेट और एक दो का सिक्का। वो दो का सिक्का मैंने उठा कर अपनी छोटी जेब में रख लिया और वो फटा मूंगफली का पैकेट अपने बैग में। घर वापस जाने की अगली ट्रेन तीन घंटे बाद थी और मेरा मन किसी भी घंटे वापस जाने को तैयार नहीं था।

उस रात मैं जल्दी सो गया, इस उम्मीद में की सुबह मुझे उस मूंगफली वाले से मिलना है। मैं अगली सुबह उठा और मम्मी ने जितने भी पराठे दिए मैंने चुप-चाप रख लिए, आज ट्रेन की आवाज़ भी नहीं आ रही थी फिर भी मैं दौड़ते हुए स्टेशन पोहचा। ट्रेन आज ७ बजे आयी और मैं झट से चढ़ कर ठंढ की परवाह किये बिना गेट पर ही खड़ा हो गया। ट्रेन जहाँ कहीं भी रुकी मैंने कोहरे में बहार झाँक-कर हर बार देखने की कोशिश की, शायद मूंगफली वाला किसी बोगी से उतर कर मेरी बोगी में आ रहा हो। मुझे उस दिन हर चाय वाले, हर चने वाले को देखकर मूंगफली वाले की भ्रम हुआ, लेकिन वो मुझे नहीं मिला। मैंने वापस आते वक़्त टिकट काउंटर पर पोहचकर जब अपनी जेब में हाथ डाला तो मुझे वो दो का सिक्का मिला जो मुझे उन पटरियों पर मिला था। मुझे हर रोज घर से मिलने वाले जो दस रूपये कम लगते थे आज उसपर मुझे ये दो का सिक्का बोहत भारी लग रहा था।
अगले दिन मैं जब ट्रेन पर चढ़ा तो मैं कहीं बैठ नहीं बल्कि वेंडरों की तरह घूम-घूम कर इस बोगी से उस बोगी हर स्टेशन पर उसे ढूंढा। मैंने उस दिन के बाद से अगले दो हफ्ते तक हर रोज उसे ढूंढा मगर वो नहीं मिला। वो ट्रेन जब भी उस स्टेशन से गुजरती तो मैं बाहर नहीं देखता था, ऐसा लगता था जैसे वो अभी भी वंही अपने घुटने पकड़ कर बैठा है। आखिरकार मैंने एक चाय वाले से यूँ ही पूछ लिया- 'वो मूंगफली वाला नहीं आ रहा क्या आजकल?', उसने कहा- 'कौन वो बुढऊ? नाह, वो नहीं आता अब शायद उसकी मूंगफलिया बिकती नहीं थी सुबह में तो आना बंद कर दिया।'

वो शायद मेरी आखिरी कोशिश थी, उसे ढूंढने या उसके बारे में पता लगाने की। मैं हार चुका था, मैं घुट रहा था, मेरी जेब में रखा वो दो का सिक्का हर रोज मुझपर भारी हो रहा था। जब उस चाय वाले ने मुझसे यह कहा की वो नहीं आता अब, तो मेरा मन काफी बेचैन सा हो गया- "क्या उसे उस दिन काफी चोटें लगीं? क्या वो बीमार है? क्या वो ठीक है? कहीं वो मर...... , नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता, उसे इतनी ज्यादा छोटे नहीं लगी होंगी, उसके पैरों में शायद दर्द हो इसीलिए न आ रहा हो या फिर इस चाय वाले की बात ही सही है बिक्री नहीं हो रही होगी, वैसे भी मेरे अलावा उसकी मूंगफलियां कौन ही लेता था।" 

मेरा मन इतना बेचैन हो गया की मैं उस दिन बीच रास्ते से ही घर वापस चला आया, और कपड़े बदल कर लेट गया। कुछ देर बाद मम्मी मेरे कमरे आयी और मेरे कपड़े उठा कर धोने के लिए ले गयी, इसी बीच अचानक मुझे उस दो रूपये की याद आयी जो की मेरी जीन्स की पैकेट में था, मैंने नजर उठा कर देखा तो पाया की मेरी जीन्स हैंगर पर नहीं है। मैं दौड़ा बाथरूम की तरफ देखा तो मम्मी जीन्स धो चुकी थी, मैंने तुरंत वो गिला जीन्स उठा कर उसका पैकेट चेक किया, दो रूपये नहीं थे। मम्मी ने पूछा 'क्या ढूंढ रहे हो?' मैंने कहा- 'दो रूपये।'
'मिल जाएगा यही कहीं गिरा होगा इतनी बेचैनी क्या है?'
'नहीं मुझे वही दो रूपये चाहिए, मुझे किसी को वापस देने थे'
'ठीक है दे देना, दो रूपये के लिए कौन भगा जा रहा है'
'नहीं-नहीं मुझे अभी वही दो रूपये चाहिए जो मेरी जीन्स में थे।'
इतना कहकर मेरी आंखे भर आयी, मम्मी ने मुझे देखा और समझ गयी ये आँसू दो रूपये के लिए नहीं हैं, यह कुछ और है, एक साढ़े १६ साल का बच्चा २ रुपयों के लिए कभी भी रोयेगा नहीं। मम्मी उठी और मुझे सीने से लगा लिया और जैसे फिर मेरे अंदर हफ़्तों से बंधा वो बाँध टूट पड़ा। मम्मी ने सारी बातें सुनी और कहा- "तुम्हारे दो रूपये वंही अलमारी पर पड़े हैं, जाओ जाकर लेलो' और 'हाँ! ऐसी चीज़े हर रोज दुनिया में होतीं हैं तुम हर उस चीज़ से इस तरह बंध नहीं सकते, मुझे ख़ुशी है की तुम्हारा मन इतना बड़ा है की तुमने आजतक उस दो रूपये को सिर्फ इसलिए संभाल कर रखा ताकि किसी दिन तुम उसे ये वापस दे सको। और यकीन रखो वो जहाँ भी है ठीक होगा, शायद एक लम्बे आराम पर हो!
रही बात उन दो रुपयों की तो तुम उसे यूँ बोझ बनाकर नहीं घूम सकते, तुम्हें उसे किसी को देना होगा, किसी ज़रूरतमंद या किसी गरीब को, विश्वास करो वो सिक्का घूम कर किसी न किसी दिन उसके पास वापस पहुँच जाएगा क्यूंकि वो उसके हक़ का सिक्का है जो हर रोज तुम्हारे जेब में होने के कारण उस तक वापस नहीं पहुँच रहा।"

मुझे ये याद नहीं की मुझे मम्मी की कितनी बातें समझ आयी कितनी नहीं लेकिन एक चीज़ जो समझ आयी थी वो ये की मेरे ऊपर कोई भार नहीं था अब, मेरे उन दो रुपयों का वजन काफी घट गया था, जो की पूरा अब मेरी माँ के पास था और शायद थोड़ा सा मेरे।
मेरे जीन्स के इस छोटे पैकेट में आज कोई भी कहानी नहीं है, न कोई भार है, न दो रूपये और ना ही कोई मूंगफली वाला।

 


तारीख: 16.06.2020                                                        अंकित मिश्रा






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