गिफ्ट

 

आज मेरी सालगिरह है. शादी के पूरे बीस साल पूरे हो गए. सोचा पत्नी को "क्या गिफ्ट दूँ?" वैसे सोच तो कितने साल से रहा था, पर अभावों के कारण कुछ खरीद ही नहीं पाया. या कह सकते हैं की शॉपिंग, गिफ्ट मेरी डिक्शनरी में नहीं आते. शादी के इतने सालों में पत्नी को ख़ास सुख ना दे पाया सिवाए "कटौती कैसे की जाये".  सबसे बड़ी बात पत्नी ने ना तो कभी मांग की और न ही कभी इच्छा दिखाई. इसी वजह से मेने कभी गिफ्ट की और ध्यान ही नहीं दिया.

शाम को ऑफिस के बाद मैं बाजार गया और एक एक दूकान को कौतुल नज़रों से देखने लगा, समझ ही नहीं आ रहा था की "क्या लूँ?"कभी साड़ी पर नज़र जाती तो कभी चूड़ियों पर. जिस दूकान पर जाता मुझे अपनी आर्थिक स्थिति नज़र आती. लेकिन आज तो "कुछ" खरीदने का पक्का इरादा करके आया था.

तभी मेरी नज़र बर्तन की दूकान पर लगे बोर्ड पर पड़ी, जिस पर '50%' के साथ साथ 'एक गिफ्ट फ्री' लिखा था. ये दूकान "मेरी जेब में फिट" पहुंचेगी, सोच दूकान के अंदर चला गया. मेरे अंदर जाते ही दूकानदार चहक कर बोला-आइये साहब क्या दिखाऊँ? मैं दूकान के सामान से ज़्यादा उसके "साहब" कहने पर फ़िदा हो गया. और थोड़ा अकड़ कर बोला-कुछ नया दिखाओ.

जी मेरे पास तो सब लेटेस्ट ही सामान है ये देखिये प्रेशर कुकर, ये कड़ाईये नया स्टीम कुकर इसमें आप इडली, डोसा बना सकते है और सब्ज़ियां आदी स्टीम कर सकते है. वो बहुत कुछ दिखा रहा था पर मेरी नज़र कुछ अलग ही ढूंढ रही थी. तभी मेरी नज़र एक नॉन स्टिक तवे पर गई. उसे देखते ही मेरी आँखों के सामने अपने घर का तवा आ गया. जो लोहे का भद्दा और मोटा है, जिसे घिस-घिस कर मेरी पत्नी की उँगलियाँ भी घिस गई है. बिना हैंडल के तवे पर जब वो रोटियां सेंकती तो अक्सर अपने हाथ और उँगलियाँ भी जला बैठती है. अब तो उस पर परांठे भी जल कर राख हो जातें है. और उसका जलता धुँआ... तपती गरमी और उमस को और भी बड़ा देता है, लेकिन मेरी पत्नी ने कभी शिकायत नहीं की. उल्टा मैं ही जली रोटियों और परांठों की शिकायत करता हूँ. इस पर भी वो तवे को कसूर ना देकर "गलती हो गई आगे से ध्यान रखूंगी" बोल कर बात खत्म कर देती है.

मेने तवे को खूब अच्छे से उल्ट पुलट कर देखा, दुकानदार मुझे ऐसे देख रहा था जैसे मैं नॉन स्टिक तवा ना खरीद कर सोने का तवा खरीद रहा हूँ. मैंने उससे तवे की कीमत पूछी तो उसने 800 रूपये बोला. मेरी तो सांस ही ऊपर नीचे होने लगी. दुकानदार शायद मेरी स्थिति भांप गया था. उसने फटाक से कहा-जी 50% डिस्काउंट के बाद 400रूपये का और साथ में कप का सेट भी फ्री.

फ्री का नाम सुनकर मेरी बांछे खिल गई लेकिन दाम अभी भी कुछ ज़्यादा लग रहे थे.लेकिन नॉन स्टिक तवा के फायदे सुनकर साथ ही घी और गैस की बचत सुनकर मैंने उसे खरीदने का मन बना लिया. दुकानदार ने मेरे बेचारेपन को देख कहा आप 350रूपये दे दो, मैं तवा और कप सेट अभी पैक कराता हूँ.

गिफ्ट लेकर मैं घर पहुंचा तो घर से पकवानों की खुशबू आ रही थी. पत्नी ने आर्थिक तंगी होने के बावजूद मेरी पसंदीदा दाल मखनी, आलू के परांठे और देसी घी का हलवा बनाया था. मुझे प्यार-व्यार तो जताना आता नहीं है, इसलिए बिना लाटलपेट के उसके हाथों में "गिफ्ट" थमा दिया. उसकी होठों की मुस्कान और ख़ुशी की कीमत इस गिफ्ट के आगे कुछ भी ना थी. सबसे ज़्यादा खुश तो वो कप के सेट को देखकर थी जो फ्री में था.

फिर हम चारों (मेरी पत्नी और बेटाबेटी) ने खाना खाया. आज आलू के परांठे बहुत ही स्वादिष्ट बने थे और सबसे बड़ी बात "जले हुए" नहीं थे.

सुबह अपनी पत्नी को उसी तवे पर परांठे सेंकते हुए देखा, तो मैंने जिज्ञाशावश उससे नए तवे के बारे में पूछा. पत्नी ने कहा.. "संदूक में रख दिया है."

मैंने पूछा-"आखिर क्यों?" तो उसने कहा कुछ समय बाद बच्चों की शादी होने वाली है तो बेटी के लिए कप सेट रख लिया है क्योंकि तवा देकर उसकी रसोई थोड़ी अलग करूंगी और नॉन स्टिक तवा अपनी बहु को "गिफ्ट" करूंगी ताकि वो इस मोटे-सड़े तवे पर अपनी उँगलियाँ ना घिसे और ना ही जलाये.

तवे पर रखा परांठा जल गया और चारों तरफ धुआं हो गया. लेकिन पत्नी की आँखों में आंसू धुंए की वजह से नहीं संदूक में रखे "गिफ्ट" की ख़ुशी के कारण थे.


तारीख: 15.07.2020                                                        मंजरी शर्मा






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